सांगला जहां देवता निवास करते हैं

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आज आखिरकार हम लोग शिमला पहुंच गए, पिछले एक माह से इस कार्यक्रम के बार-बार बनने और स्थगित होने से मैं परेशान हो गया था। सांगला क्षेत्र में पहली बार मैं 1997 में आया था। तब हम रोहतांग से ग्राम्फू, बाताल, चंद्रताल, कुंजुमदर्रा, काजा किब्बर, किन्नौर आदि होते हुए सांगला पहुंचे थे, लेकिन उस समय सांगला में हो रही तेज बारिश के कारण अगले ही दिन घाटी से पलायन कर नारकंडा चले गए थे। हमारे यहां से गुजरने के चौथे दिन ही वांगटू पर बादल फटने की दुर्घटना हुई थी और वहां बड़े क्षेत्र में भीषण तबाही मच गई थी। वांगटू से टापरी तक के 8 किमी मार्ग का भूगोल ही बदल गया था।

मेरे मन में फिर सांगला आने की चाहत बनी हुई थी और इस वर्ष मैं इसके लिए प्रयासरत था, परंतु बेटी के समर कैंप के कारण इस बार भी कार्यक्रम में कई बार बदलाव हुआ। अंतत: बेटी का समरकैंप रद्द हो गया और मैंने तुरंत सांगला जाने का निर्णय लिया। नक्शे, कैमरे, हैंडी कैम, फिल्में व बैटरियां आदि पहले ही तैयार कर ली गई थीं, बस कपड़े, दवाएं आदि जुटाए और परिवार सहित मैं अपनी इंडिगो-डीजल लेकर निकल पड़ा। एक अन्य कार में मेरे बड़े भाई डॉ.अनिरुद्ध कुमार सिंह अपनी पत्नी व पुत्री के साथ तथा एक मित्र विवेक व उनकी पत्नी नेहा भी इस रोमांचक यात्रा में हमारे साथ हो लिए। सांगला हिमाचल की सुदूर घाटियों में से एक है। जहां किन्नर कैलाश पर्वत माला अपनी सदा हिमाच्छादित चोटियों के साथ विराजमान है।

आरंभ यात्रा का

पहले दिन हम अलीगढ़ से दिल्ली होते हुए चंडीगढ़ पहुंचे और रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन शिमला आ गए। यद्यपि मैं चंडीगढ़ से सीधे सराहन आना चाहता था, परंतु बच्चों के साथ होने के कारण यह तय किया गया कि प्रतिदिन सफर सीमित ही रखा जाए। हिमाचल प्रदेश की राजधानी होने के कारण समुद्रतल से 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शिमला सड़क मार्ग से व रेल से भी जुड़ा हुआ है। इसकी खूबसूरती व आसान पहुंच के कारण यहां वर्ष भर पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है। यहां हमारे रुकने की व्यवस्था हमारे वैज्ञानिक मित्र डॉ. एस.एस. शर्मा ने विश्वविद्यालय के अतिथिगृह में कर दी थी। शाम को हम देर तक रिज और माल पर टहलते रहे। यहीं मौसम की पहली फुहार पड़ी और कई पर्यटक अपने होटलों को लौट गए, परंतु हम लोग मौसम का आनंद लेते रहे। रिज पर ही हमने हिमाचल पर्यटन के गुफा रेस्टोरेंट में रात्रिभोज किया और फिर समरहिल स्थित अपने गेस्ट हाउस में लौटकर विश्राम किया। शिमला में पानी की भारी कमी के चलते सुबह तैयार होकर निकलने में हमें थोड़ा विलंब हुआ। सड़क पर हम 9 बजे निकल पाए, इसका परिणाम यह हुआ कि हम भारी ट्रैफिक में फंस गए और शिमला से बाहर आते-आते सवा घंटा लग गया। ढली पर कारों में हवा आदि चेक कराकर हम कुफरी और फागू होते हुए नारकंडा की ओर चल पड़े। 15-20 किलोमीटर पार करते-करते हमारी सुबह की झुंझलाहट गायब होने लगी। अच्छी सड़क, सुहाना मौसम, देवदार के पेड़ों, छोटे-बड़े ढलानों पर घास तथा चीड़ की सूखी पत्तियां और वातावरण में चीड़ की महक ने हमारे मूड को जल्दी ही अच्छा बना दिया। रास्ता घुमावदार था, परंतु सड़क की सतह अच्छी होने से हम लोग शीघ्र ही थियोग आ गए।

बढ़ने लगी गर्मी

थियोग 2400 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक छोटा सा कस्बा है। यहां के ढलान बेहद खूबसूरत हैं तथा फरवरी मार्च में यहां स्कीयर्स जुटते हैं। हम लोग मार्ग का आनंद लेते हुए शीघ्र ही नारकंडा आ गए, जो शिमला से 70 किलोमीटर दूर है तथा 2700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से कई ट्रैक सूट शुरू होते हैं। यहां हिमाचल पर्यटन निगम का लग्जरी होटल, होटल हाटू एक मनोरम तथा ऊंचे स्थान पर निर्मित है, जहां से घाटी का विहंगम दृश्य देखना बेहद अच्छा लगता है। हमने यहां चाय तथा स्नैक्स लिए और आज की मंजिल सराहन स्थित हिमाचल पर्यटन निगम के होटल श्रीखंड में उसी दिन बुकिंग करवा दी। नारकंडा में हाटू देवी का मंदिर हाटू चोटी पर निर्मित है। यहां से आसपास के पहाड़ों व बर्फीली चोटियों का दृश्य अच्छी तरह देखा जा सकता है। थोड़ी देर बाद ही हम आगे चल पड़े। कुछ ही देर में तेजी से नीचे उतरने लगे और देवदार की जगह चीड़ के पेड़ अधिक दिखाई देने लगे। दृश्य मनोहारी से सामान्य होने लगा धीरे-धीरे गर्मी भी बढ़ने लगी यहां तक कि हम लोगों ने कारों के एयरकंडीशनर भी चला लिए। यही सब देखते-करते हम रामपुर आ पहुंचे। किंगल से सतलुज नदी भी सड़क के साथ-साथ हमारे एक ओर दिखने लगी। सतलुज कैलाश मानसरोवर से निकलने वाली चार नदियों में से एक है। अब तक दोपहर बाद साढ़े तीन बजे का समय हो गया था। हम लोगों ने रामपुर में घुसते ही हिमाचल पर्यटन के कैफे सतलुज में दोपहर का भोजन लिया। रामपुर बुशहर इस क्षेत्र का सबसे बड़ा नगर है। यह इस क्षेत्र की सभी प्रशासनिक, शैक्षिक तथा आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। यहां सभी तरह के वाहनों के रख-रखाव के लिए कईअच्छे गैराज भी हैं।

संकरे रास्ते और तेज बरसात

रामपुर से पेट्रोल-डीजल भरवाकर हम आगे बढ़ चले। अचानक मौसम तेजी से बदलने लगा और आसमान में बादल छा गए। हम लोग मुश्किल से 20-25 किलोमीटर की दूरी पार करके जिओरी तक पहुंचे ही थे कि पानी बरसने लगा। यहीं से हमें सराहन के लिए मुख्य सड़क छोड़कर दायें मुड़ना था। अब तक सड़क की सतह और चौड़ाई दोनों ही अच्छी थीं, परंतु मोड़ के बाद सतह तो ठीक थी लेकिन चौड़ाई बेहद कम हो गई। कहीं-कहीं तो चौड़ाई इतनी कम थी कि एक बार में एक वाहन मुश्किल से निकल पाता। ऊपर से पानी तेजी से बरसने लगा। सभी बच्चे कार के अंदर से बरसते पानी को देखकर आनंदित हो रहे थे। स्त्रियां चिंतित थीं और मुझे कार चलाने के कभी-कभी होने वाले अनुभव मिल रहे थे। संकरी सड़क, तेज बरसात, मोड़ पर मोड़ कम होती रोशनी, कुल मिलाकर एक अलग ही वातावरण का सृजन कर रहे थे। केवल 17 किलोमीटर की दूरी पार करने में डेढ़ घंटे का समय लग गया, परंतु ठहरने की बुकिंग पहले से होने के कारण हम बेफिक्र थे। आखिरकार हम लोग सराहन स्थित होटल श्रीखंड आ पहुंचे।

सराहन में सेना का एक बड़ा पड़ाव है। कई बहुमंजिली इमारतें हैं तथा ठहरने के लिए कुछ अच्छे और कुछ सामान्य स्थान हैं। सबसे अच्छे स्थानों में से एक होटल श्रीखंड है, जो हिमाचल पर्यटन निगम का है तथा इसका नाम कैलाश पर्वतमाला के श्रीखंड महादेव शिखर के नाम पर रखा गया है। दूसरा स्थान यहां के एकमात्र आकर्षण भीमकाली मंदिर का अतिथिगृह है। यहां स्थित भीमकाली मंदिर पहले बुशहर साम्राज्य का निजी मंदिर था, पर बाद में इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया। इस मंदिर को क्षेत्र में अपार मान्यता प्राप्त है, दूर-दूर से लोग यहां मन्नत मांगने आते हैं। यह मंदिर अपनी विशिष्ट निर्माण शैली, लकड़ी की कलात्मक नक्काशी और चांदी चढ़े दरवाजों के लिए विख्यात है। उलटे पिरामिड की शैली में बने इस मंदिर का नीचे बना आधार छोटा है, पहली मंजिल बड़ी और दूसरी मंजिल पहली से भी बड़ी है जिसके ऊपर छत्र आदि है। मुख्य मंदिर भी दूसरी मंजिल पर ही है। यहां मंदिर में चमड़े का कोई भी सामान, यहां तक कि बेल्ट और पर्स आदि भी अंदर ले जाना वर्जित है। मंदिर का अतिथिगृह प्रांगण में ही है। यहां का मूल मंदिर 10वीं शताब्दी में बना बताया जाता है, एक मंदिर 16वीं शताब्दी का है, जिसके बाद में भूकंप से क्षतिग्रस्त हो जाने के कारण नया मंदिर उसी शैली में 1930-35 में बनाया गया है। मंदिर पर लकड़ी की नक्काशी बेहद खूबसूरत तथा बारीक है। मंदिर निर्माण की एक और विशिष्टता यह है कि यहां लकड़ी के स्लीपर तथा पत्थर की सिलें एक के ऊपर एक रखकर मुख्य दीवारें बनाई गई हैं तथा ढलवां छतें निर्माणशैली में बौद्ध प्रभाव को दर्शाती हैं। निर्माण की इसी विशिष्टता के कारण यह इमारत सर्दी-गर्मी के चरम प्रभाव को आसानी से सहन कर लेती है।

होटल श्रीखंड का निर्माण भी मंदिर की शैली में ही हुआ है। यह होटल इस क्षेत्र की ट्रेकिंग टूर गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। हमारे होटल पहुंचने के बाद बारिश रुक गई थी। हमने सबसे पहले गरमागरम चाय पी, फिर गर्म कपड़े निकालकर बच्चों को पहनाए। गीजर चालू थे, अत: तुरंत स्नान कर तैयार होकर मंदिर आ पहुंचे। मंदिर प्रांगण में बजते भजन दूर से ही सुनाई दे रहे थे और घाटी में भजन की गूंजती ध्वनि कर्णप्रिय लग रही थी। आसमान साफ हो चला था। आसपास के बर्फीले पहाड़ एकदम धुले-पुंछे से लग रहे थे, परंतु रोशनी कम हो जाने के कारण स्टिल फोटोग्राफी संभव नहीं रह गई थी। हम लोगों ने मंदिर की सायंकालीन आरती में सम्मिलित होकर पुजारी जी से मंदिर की कई कथाएं सुनीं और विदा लेकर वापस अपने होटल आ गए। होटल पहुंचकर रात्रि भोजन के बाद देर रात तक प्रांगण में टहलते रहे और दूर टिमटिमाती रोशनियों, बढ़ती ठंड और रूमानी वातावरण का आनंद लेते रहे।

सतलुज के साथ-साथ

सुबह करीब पांच बजे उठकर मैं सबसे पहले मंदिर के पीछे वाली सड़क पर जा पहुंचा और मंदिर की पृष्ठभूमि में पड़ने वाली हिममंडित चोटियों पर सूर्य की प्रथम किरणों के पड़ने के कारण बनने वाले दृश्य को स्टिल कैमरे तथा हैंडीकैम में कैद करता रहा। यहां से ऐसा लगता है जैसे यह मंदिर दुनिया से दूर ऊंचे हिमशिखरों के मध्य देवताओं का एकमात्र निर्माण हो और यह प्रकृति के साथ एकाकार हो गया है। मैं इस दृश्य में ऐसा खोया कि एक घंटे से अधिक समय बीत गया। समय का आभास होने पर मैं वापस होटल आ गया। अब तक हिमशिखरों के आसपास बादल बनने लगे थे। होटल आकर तैयार होते-होते नौ बज गए। आज सफर मुश्किल से 110 किलोमीटर का ही था, अत: आराम से चलने में कोई हानि नहीं थी।

हम लोगों ने अच्छी तरह नाश्ता कर एक बार फिर मंदिर का चक्कर लगाया और दस बजे वापस ज्यूरी की ओर चल पड़े। अब तक आसपास के सभी शिखरों पर बादल अपना डेरा जमा चुके थे। यद्यपि मध्य आकाश में सूर्यदेव अभी भी अपनी आभा बिखेर रहे थे। सूर्य की गर्मी से घाटी से उठते भाप के बादल आज दोपहर बाद बरसात होने की साफ भविष्यवाणी कर रहे थे। कल जो सड़क वर्षा के कारण खतरनाक लग रही थी, आज खुले मौसम में आनंददायक लग रही थी। हम लोग पहाड़ों के साथ बादलों के खिलवाड़ का आनंद लेते जल्दी ही ज्यूरी आ गए और एक बार फिर भारत-तिब्बत सीमा पर थे। यहां से हम लोगों को करछम तक जाना था जहां से वसपा सांगला घाटी का मार्ग मुड़ता है। ज्यूरी के आगे सड़क हाइवे होते हुए भी अधिक समतल तथा कम चौड़ी होती जा रही थी। सतलुज लगातार साथ-साथ थी कहीं तो चौड़ाई मिलने पर धीमी और कहीं वेगवान होकर पत्थरों से अठखेलियां करती अपने नाम को सार्थक कर रही थी। वैसे विद्युत परियोजनाओं के चलते सतलुज पर कई बांध बनाए जा रहे हैं, फिर भी नदी में काफी जल था। पहाड़ निरंतर ऊंचे और विशाल होते जा रहे थे। हम लोग धीरे-धीरे गहरे पहाड़ों में घुसते जा रहे थे।

आश्चर्य निर्माण के

जिओरी से वांगटू का फासला 40 किलोमीटर के आसपास है। यहां सड़क बनाना बेहद दुरूह कार्य था, क्योंकिपहाड़ बेहद चट्टानी है तथा पेड़-पौधे भी कम हैं। पूरे रास्ते पर नदी के सहारे घाटी की चौड़ाई मुश्किल से डेढ़ किलोमीटर है। यहां हमें भारतीय सेना तथा सीमा सड़क संगठन के निर्माणकर्ताओं के कौशल के कई उदाहरण देखने को मिले। कई जगह पहाड़ों को इस तरह काटा गया है कि 100-125 मीटर तक पहाड़ सड़क पर मकान के छज्जों की तरह झुके हुए हैं। एक-दो स्थानों पर तो पहाड़ों के मध्य से छोटा मार्ग निकाला गया है, जो छोटी-मोटी सुरंग जैसा है।

मेरे साथ के सभी लोग इस मार्ग पर पहली बार आए थे और इसके निर्माण कौशल को देखकर चमत्कृत थे। यहीं मेरे बड़े भाई डॉ. ए.के. सिंह ने पहाड़ों पर ही पाई जाने वाली कुछ दुर्लभ वनस्पतियों के बारे में हमें अनोखी जानकारियां दीं। उन पौधों को उनके प्राकृतिक परिवेश में देखना अपने-आपमें एक अनूठा अनुभव था। रुकते-रुकते हम लोग वांगटू आ गए, जहां 1997 में बादल फटने से आगे चट्टानी सैलाब के कारण सतलुज का रास्ता अवरुद्ध हो गया था तथा यहां से टापरी के मध्य 8 किलोमीटर लंबाई और डेढ़ किलोमीटर चौड़ाई की झील जैसी बन गई थी। सतलुज का पानी 35 मीटर ऊंचाई तक भर गया था। इस रुकावट को सीमा सड़क संगठन ने ठीक कर केवल 40-45 दिनों में रास्ता खोल दिया था। बाद में सड़क को 50 मीटर ऊपर फिर से बनाया गया और आज यहां भारत का सबसे लंबा मध्य में बिना आधार का लटकता पुल बना है। इस पर भारी वाहन भी आसानी से गुजर जाते हैं। यह पुल भी एक अभियांत्रिकी आश्चर्य जैसा है।

यहां देर तक रुककर मैंने 1997 में देखे विद्युत परियोजना संबंधी निर्माण, जलनिकासी मार्ग, सड़क और अब की स्थिति का अंतर सभी लोगों को बताया। यहां से चलकर हम लोग टापरी होते हुए करछम पहुंचे, जहां से खूबसूरत सांगला घाटी का बेहद संकरा मार्ग शुरू होता है। इसी मोड़ पर बसपा नदी सांगला से आकर सतलुज से संगम करती है, परंतु इस बार बसपा में जरा भी पानी नहीं था। अत: संगम बसपा की ओर से एकदम सूखा था। कारण वही जलविद्युत परियोजना के कारण सांगला में बसपा नदी पर बनाया गया बांध तथा जल संग्रहण क्षेत्र (रिजर्वायर)। यहां से सड़क बेहद संकरी तथा सतह एकदम पथरीली है। यह सड़क सीमा सड़क संगठन के अंतर्गत नहीं आती। अत: इसकी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

बादलों का मायावी संसार

इस घाटी में आते हुए बायीं ओर का पहाड़ बेहद चट्टानी तथा कठोर है और इस पर वनस्पतियां, पेड़ आदि न के बराबर हैं। जबकि नदी के उस पार दायीं ओर का पहाड़ हरियाली से भरा है। शायद यह इस घाटी में बहने वाली हवा का कमाल है। 18 किलोमीटर सांगला तथा वहां से 26 किलोमीटर चितकुल की पूरी दूरी में हम पहाड़ को अपने बायें तथा नदी को दायें हाथ पर ही पाते हैं और बायें ओर का पूरा पहाड़ पथरीला, चट्टानी और हरियाली रहित है। घाटी में घुसते ही हमारा सामना एक बार फिर भारी बादलों और हलकी फुहारों से हुआ और सड़क की कम चौड़ाई हमें और भी कम लगने लगी। हम धीरे-धीरे चलते हुए पहाड़ों की गहराई में घुसते जा रहे थे। बादलों के कारण हम आसपास के पहाड़ों को देख नहीं पा रहे थे। सभी स्ति्रयां गंतव्य तक शीघ्र और सुरक्षित पहुंचने के लिए व्यग्र थीं। एक घंटे से कुछ अधिक समय में हम सांगला जा पहुंचे। आसपास का दृश्य सीमित था, परंतु जितना भी था सांगला की खूबसूरती समझाने में सक्षम था।

सांगला घाटी

सांगला घाटी लगभग 55 किलोमीटर लंबी तथा 10 किलोमीटर चौड़ी है। यह करछम से शुरू होकर चितकुल से पांच-छह किलोमीटर आगे जाकर तीखे ढलान वाले पहाड़ों से मिल जाती है। सड़क चितकुल तक ही है, उसके आगे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की चौकियां हैं। ऊंचे पहाड़ों को पैदल पारकर उत्तरांचल की हर की दून व गंगोत्री तक पहुंचा जा सकता है, परंतु इसके लिए बर्फीली चोटियों तथा दर्रो को पार करना होगा। यह स्थान किन्नर कैलाश पर्वत श्रृंखला के मध्य में स्थित है।

थोड़े प्रयास के बाद हमें यहां के एक अच्छे होटल मोनल रीजेंसी में रहने का स्थान मिल गया। इसके मालिक श्री भीष्म सिंह दुजान कामरू ग्राम के मूल निवासी हैं। उन्होंने हमें इस क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति से जुड़ी कई अनोखी बातें बताई। होटल के बाहर बहुत बड़ा खाली मैदान है तथा कार पार्किग की भी अच्छी व्यवस्था है। हम बाजार से ही भोजन करके आए थे, अत: शीघ्र ही अपने कमरों में विश्राम करने चले गए। चार बजे के आसपास अचानक तेज हवा चलने लगी और बादल तेजी से ऊपर उठने लगे। आधे घंटे में ही आसमान काफी साफ हो गया और जो दृश्य सामने आया वह वर्णनातीत था। हममें से किसी ने इतने सुंदर दृश्य की कल्पना भी नहीं की थी। सामने बहती नदी, पहाड़ों के निचले ढलानों पर देवदार के शानदार वृक्ष, उसके ऊपर वृक्षरहित चारागाह और उसके पीछे ऊंचे पहाड़ों की बर्फीली चोटियां जैसे जादू के जोर से हमारी आंखों के सामने प्रकट हो रहे थे। हमारे पीछे की ओर एकदम नग्न चट्टानी पहाड़ थे, जिन पर पड़ी ताजी बर्फ सायंकालीन धूप में चमक रही थी। बीच-बीच में उड़ते-सिमटते बादल मायावी से लग रहे थे।

जहां हम टिके थे, उसके ठीक पीछे ही कामरू ग्राम है। कामरू शब्द वस्तुत: कामरूप का अपभ्रंश है। गांव का यह नाम कामरूप देवी के यहां आकर बसने और ब्रदीनाथ देवता से उनके विवाह के कारण पड़ा है। ऐसा माना जाता है कि यही देवी कालांतर में चितकुल जाकर बस गई। हम लोग शाम को होटल के लान में बैठकर देर तक अपने चारों ओर पहाड़ों और बादलों का खेल देखते रहे तथा चाय-कॉफी पीते रहे। रात को हम लोगों ने कैंपफायर की व्यवस्था की। दरअसल, हमारे साथी विवेक-नेहा के विवाह को आज ही तीन माह पूरे हुए थे। देर रात तक हम लोग तथा होटल में रुके अन्य यात्री कैंपफायर के चारों ओर नाचते-गाते रहे। इस दौरान संगीत के लिए कार स्टीरियो का उपयोग किया गया। नाच-गाने के बाद खाना खाकर हम लोग सो गए।

पल-पल बदलते रंग

अगला दिन हम लोगों की इस यात्रा की दृष्टि से अपूर्व था। हम लोग सुबह साढ़े पांच बजे से ही उठकर बाहर का नजारा देखने लगे। दिन एकदम साफ था और आसपास के सभी पहाड़ बेहद शानदार लग रहे थे। रात में ऊंची चोटियों पर बर्फ पड़ी थी। सूरज की रोशनी में बर्फीले पहाड़ सुनहरे लग रहे थे। हर पांच मिनट बाद पहाड़ों की रंगत बदल जाती थी। सुबह सुनहरे पहाड़ आधा घंटे बाद चांदी जैसे सफेद दिखने लगे थे और अगले आधे घंटे बाद बर्फ अपनी स्वाभाविक सफेद रंगत में दिखने लगी।

हमें पहले ही पता चल गया था कि सांगला से चितकुल का मार्ग अधिक ऊबड़-खाबड़ है। इसलिए हमने अपनी कारें यहीं छोड़ दीं और आगे बढ़ने के लिए एक टैंपो ट्रैक्स किराये पर ले लिया। वह साढ़े नौ बजे हमें लेकर चितकुल की ओर चल पड़ी। सांगला से बाहर निकलते ही घाटी की चौड़ाई काफी बढ़ गई। सड़क जगह-जगह ऊबड़-खाबड़ थी। मार्ग पहले से भी संकरा था और घाटी एकदम 40-50 मीटर सीधी गहराई में। छह किलोमीटर आगे रक्क्षम है। यहां बसपा की मूलधारा में दायीं ओर से एक और छोटी धारा आकर मिलती है। यहां का एक दृश्य बेहद मनोहारी है। इसी जगह बंजारा कैंपस प्रा.लि. का कैंप स्थल है। अब हमें दायीं ओर अनेक बर्फीली चोटियां दिखने लगी थीं। नीचे नदी, उसके दोनों ओर शानदार वृक्ष तथा बर्फीली चोटियां हमें दो मिनट पूर्व देखे गए दृश्य को भुला देती थीं। हर आने वाला दृश्य पिछले से बेहतर प्रतीत होता था। यहां पूरे पहाड़ चीड़, देवदार, चिलगोजे, प्लम तथा शानदार भोजपत्र के वृक्षों से भरे पड़े हैं। एक स्थान पर मार्ग के दोनों ओर एक किलोमीटर तक चीड़ की विभिन्न प्रजातियों के वृक्ष छाए हुए हैं। हम लोगों को यहां फिर वनस्पति विज्ञान का प्रायोगिक अनुभव हुआ। हम लोग वृक्षों के एकदम शंक्वाकार रूप को देखकर चकित हो रहे थे।

धरती पर स्वर्ग

यह पूरा मार्ग ही बसपा नदी, हरियाली, छोटी धाराओं, पिघलते ग्लेशियरों, बर्फीली चोटियों के कारण बेहद नयनाभिराम है। शायद यह धरती पर स्वर्ग का एक नमूना है। हम लोगों ने कई जगह रुककर चित्रांकन किया, हैंडी कैम तो लगातार चल ही रहा था। अंत में एक मोड़ काटकर जैसे ही हम चितकुल के बाहरी क्षेत्र में पहंुचे, अविस्मरणीय दृश्य देखा। हमारे सामने नीचे चौड़ी घाटी में पहाड़ी खेतों के मध्य, लहराती, बलखाती वेगवान बसपा नदी थी, उससे ऊपर कुछ बिना बर्फ के तीखे ढलान थे और उसके ऊपर हमेशा बर्फ से ढकी रहने वाली कई चोटियां थीं। इसे देखकर हमें एकदम से बचपन में बनाई जाने वाली पेंटिंग याद आई, जिसमें तीन-चार पहाड़ी चोटियों के पीछे से सूर्य झांकता है। एक सर्पाकार नदी पहाड़ से निकलती है और एक ओर एक झोंपड़ी होती है, जिसके सामने से निकलकर एक रास्ता नदी तक जाता है। ऐसा लग रहा था कि बचपन की वही पेंटिंग सामने है। बस इसके रंग एकदम जीवंत हैं। हम लोग इस दृश्य को देखकर अवाक थे। यहां तक कि सारे रास्ते शोर मचाते आए बच्चे भी इस दृश्य में खो गए।

वास्तव में यह दृश्य शब्दों और वर्णन से परे है। इसे समझने के लिए देखना आवश्यक है। ड्राइवर हमसे आगे चलने को कहता रहा और हम लोग दृश्य के मायाजाल से निकल ही नहीं पा रहे थे। काफी देर बाद हम लोग चितकुल में घुसे और एक होटल में खाने का ऑर्डर देकर नीचे नदी की ओर उतर गए। यहां नदी पर एक बेहद पुराना परंतु दृश्य से मेल खाता हुआ लकड़ी का पुल था। उसे पार कर हम लोग नदी के दूसरे किनारे पर जा पहंुचे। यहां नदी का पानी, बेहद साफ, ठंडा और वेगवान था। बड़ी छोटी चट्टानों से टकराता पानी ध्वनि और दृश्य का बेहतरीन संयोग प्रदर्शित कर रहा था। हमारे मना करने पर भी बच्चे जूते उतारकर पानी में पैर डालने लगे, लेकिन ठंड के कारण तुरंत ही बाहर भी आ गए। हम लोग नदी के किनारे सुस्ताते हुए दृश्य को यथासंभव अपनी आंखों और कैमरों में भरते रहे। इस घाटी की सुंदरता ही शायद वह कारण है जो कहा जाता है कि यहां देवता वास करते हैं। सचमुच यह स्थान देवताओं के निवास के लिए उत्तम है।

जंगल भोजपत्र के

हर तरफ हरियाली से भरा यह क्षेत्र भोजपत्र के अपने घने जंगलों के लिए विख्यात है। भोजपत्र वह वृक्ष है जिसकी छाल और पत्तों का कभी कागज की तरह प्रयोग कर हमारे ऋषि-मुनियों ने कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की है। भोजपत्र टिंबर लाइन (समुद्रतल से 3300 मीटर की ऊंचाई) से ऊपर उगने वाले दुर्लभ वृक्षों में से एक है। इसका जंगल हजारों वर्षो में पनपता है। भारी मात्रा में इन वृक्षों को यहां देखकर हमारी आत्मा तक तृप्त हो गई। काफी देर बाद हम लोग ऊपर आए और फिर होटल में भोजन कर पास ही स्थित देवी मंदिर को देखा। मंदिर स्थानीय शैली में बनी एक पुरातन इमारत है। यहां की आबादी 600 के लगभग है तथा यह 3750 मीटर पर स्थित है। यहां देवी लक्ष्मी के रूप में हैं। एक रोचक बात यह है कि यहां की देवी चार-पांच साल बाद जब कभी अपनी दैवीय शक्तियों में कमी अनुभव करती हैं तो उनका डोला गंगोत्री तथा ब्रदीनाथ जाता है। वहां छह-सात दिन ठहरकर देवी पुन: शक्ति अर्जित कर वापस आ जाती हैं।

हम लोग बार-बार पीछे देखते हुए वापस सांगला आ गए। सारे रास्ते हम लोग चितकुल के शानदार दृश्य के बारे में ही बातें करते रहे। चार बजे तक हम लोग सांगला वापस अपने होटल पहुंच गए। चाय-कॉफी लेकर हम लोग विश्राम करने लगे। थोड़ी देर बाद अन्य लोगों को विश्राम करता छोड़कर मैं अपने बड़े भाई डॉ. ए.के. सिंह के साथ कामरू ग्राम चल पड़ा। ठाकुर भीष्म सिंह दुधान से इस ग्राम की कई कहानियां सुनने के बाद वहां जाने से अपने को रोक पाना बेहद मुश्किल था।

कामरू गांव में

कामरू ग्राम सांगला के मध्य से एक पक्के मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। इसी गांव से बुशहर साम्राज्य का संचालन होता था। हम लोग यहां होकर गांव के सबसे ऊंचे स्थल मुख्य महल तक गए, जिसे अब म्यूजियम में बदलने की तैयारी चल रही है। गांव के मध्य में एक चौक तथा वहीं कामरू बद्रीनाथ का मंदिर है, जहां हम लोग संयोगवश देवताओं के डोले के बाहर आने के दुर्लभ मौके के साक्षी बने। हम दोनों अंधेरा होते-होते अपने होटल पहुंच सके। फिर रात्रि भोजन कर विश्राम के लिए अपने कमरों में चले गए।

अगले दिन हम लोग नाश्ता करके सवा आठ बजे ही वापस चल पड़े। सांगला-चितकुल से सुंदर दृश्य तथा वातावरण हम लोगों ने कभी नहीं देखे थे। हम लोग इतनी जल्दी वापसी नहीं चाहते थे परंतु जैसे हर अच्छी चीज का अंत होता है, हम लोग सांगला-सांगला रटते हुए शिमला होकर वापस चंडीगढ़ आ गए फिर एक दिन रुककर वापस अलीगढ़।

इस यात्रा में कुल आठ दिन का समय लगा और तीन बच्चों समेत कुल नौ लोगों ने दो कारों में बड़े आराम से यात्रा संपन्न की। 1640 किलोमीटर की यह दूरी तय करने में कुल खर्च 25 हजार रुपये आया। इसमें डीजल, पेट्रोल, आवास, भोजन व दवाएं आदि सभी व्यय शामिल हैं। दवाएं वैसे तो हमने सभी परेशानियों से संबंधित रख ली थीं, लेकिन इनमें प्रयोग केवल उलटी की दवाओं का ही हुआ था, वह भी सतर्कता में रोज सुबह बच्चों को दे दी जाती थी। पूरे समूह के लिए यह एक अविस्मरणीय यात्रा थी।

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