कालजयी कालिंजर

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कालिंजर को कालजयी यूं ही नहीं कहा जाता है। इसने कालखंड के प्रत्येक प्रसंग को, चाहे वो प्रागैतिहासिक काल के पेबुल उपकरण हों, पौराणिक घटनाएं हों या 1857 का विद्रोह हो, सबको बहुत ही खूबसूरती से अपने आंचल में समा रखा है। वेदों में उल्लेख के आधार पर जहां इसे विश्व का प्राचीनतम किला माना गया है, वहीं इसके विस्तार और विन्यास को देखते हुए आधुनिक एलेक्जेंड्रिया से भी श्रेष्ठ। वेदों में इसे रविचित्र और सूर्य का निवास माना गया है। पद्म पुराण में इसकी गिनती नवऊखल अर्थात सात पवित्र स्थलों में की गई है। मत्स्य पुराण में इसे उज्जैन और अमरकटंक के साथ अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है। जैन ग्रंथों और बौद्ध जातकों में इसे कालगिरि कहा गया है।

पौराणिक महत्व

कालिंजर का पौराणिक महत्व शिव के विष पान से है। समुद्र मंथन में मिले कालकूट के पान के पश्चात शिव ने इसी कालिंजर में विश्राम करके काल की गति को मात दी थी। महाभारत के युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर ने यहां के कोटतीर्थ में स्नान किया था। मध्यकालीन इतिहास में कालिंजर भोरखां की मौत का कारण बना। मेवाड़ विजय के बाद भोरखां की महत्वाकांक्षाएं उफान पर थी। वह कालपी, खजुराहो होता हुआ सीधे कालिंजर पहुंचा, किन्तु सात माह के घेरे के पश्चात भी चंदेल हथियार डालने को तैयार नहीं थे। अत: भोरखां ने किले के सामने कालिंजरी पहाड़ी पर तोपों को चढ़ाया और गोलाबारी कराई, किन्तु एक गोला फटने के बाद कालिंजर भोरखां की कब्रगाह बन गया। उसके पुत्र इस्लाम खां ने चंदेल नरेश कीरत सिंह को उसके 70 सहयोगियों के साथ कत्ल करके अपने पिता को श्रद्धांजलि दी।

कालिंजर अपने शिल्प के कारण अद्वितीय है। यह समुद्र तल से 375 मीटर ऊंचाई पर है। 90 डिग्री पर खड़ी इसकी दीवारें आज भी कारीगरों को विस्मित करती हैं। किले के सात द्वार- गणेश, चंडी, बुद्ध, हनुमान, आलमगीर, लाल व बड़ा दरवाजा आज भी पूरी तरह महफूज हैं। आलमगीर दरवाजे का निर्माण कार्य औरंगजेब ने करवाया था।

पर्यटकों के लिए आकर्षण

किले के परिसर में फैली मूर्तियां पर्यटकों और दर्शकों के जबरदस्त आकर्षण का केंद्र हैं। सर्वाधिक मूर्तियां भौव धर्म से संबंधित है। काल भैरव की प्रतिमा सर्वाधिक भव्य है। 32 फीट ऊंची और 17 फीट चौड़ी इस प्रतिमा के 18 हाथ हैं। वक्ष में नरमुंड और त्रिनेत्र धारण किए यह प्रतिमा बेहद जीवंत है। झिरिया के पास गजासुर वध को वर्णित करती मंडूक भैरव की प्रतिमा दीवार पर उकेरी गई है। उसके समीप ही मंडूक भैरवी है। मनचाचर क्षेत्र में चतुर्भुजी रुद्राणी काली, दुर्गा, पार्वती और महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमाएं हैं।

कालिंजर के वास्तुकारों ने क्षेत्र की दुर्गम स्थिति को देखते हुए पेयजल की सुगम व्यवस्था की ओर इसके लिए जलाशय का निर्माण किया। काल भैरव की प्रतिमा के बगल में चट्टान काटकर ‌स्वर्गारोहण तालाब बनाया गया जिसका उल्लेख अबुल फजल ने किया है। पाताल गंगा, पांडु तालाब, बुढि़या ताल कुछ अन्य जलाशय हैं जिसका पौराणिक महत्व है। कहा जाता है कि इसी में स्नान करने से कीर्तिवर्मन का कुष्ठ रोग समाप्त हुआ था।

कालिंजर के किले पर जिन राजवंशों ने शासन किया उसमें दुष्यंत- शकुंतला के पुत्र भरत का नाम सर्वप्रथम उल्लिखित है। कर्नल टॉड के अनुसार उसने चार किले बनाए जिसमें कालिंजर का सर्वाधिक महत्व है। 249 ई. में यहां हैहय वंशी कृष्णराज का शासन था, तो चौथी सदी में नागों का जिनसे सत्ता गुप्तों को हस्तांतरित हुई। इसके पश्चात यहां चंदेलों का यशस्वी शासन रहा जिसका विनाश 1545 ई. में भोरशाह (भोरखां) सूरी ने किया। मुगल काल में कालिंजर कविराज बीरबल की जागीर था।

नीलकंठ मंदिर

जो मंदिर कालिंजर के प्रांगण में सर्वाधिक पूज्य हैं उनमें नीलकंठ मंदिर प्रमुख है जिसका निर्माण नागों ने कराया। कोटितीर्थ के पश्चात वैष्णव मंदिर है। किले में जगह-जगह फैले मुख लिंग प्रतिहारों की देन हैं।  कालिंजर के अन्य दर्शनीय स्थलों में सीतासेज, राजा अमान सिंह महल, राजकीय म्यूजियम प्रमुख है। इस म्यूजियम में लकुलेश, चतुर्मुखी शिव लिंग सहस्त्र लिंग के अतिरिक्त गुप्त, प्रतिहार, चंदेल काल की अनेक अमूल्य धरोहरें मौजूद है।

कैसे जाएं

कालिंजर बांदा से 50 किलोमीटर की दूरी पर है। बांदा और सतना निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। दिल्ली से बांदा के लिए कई रेलगाडि़यां हैं। खजुराहो, चित्रकूट और कालिंजर पर्यटकों के लिए नया त्रिकोण बना रहे हैं। खजुराहो के लिए मुंबई, दिल्ली व वाराणसी से सीधी उड़ानें भी हैं। सैलानी वहां से भी कालिंजर पहुंचते हैं। बांदा प्रशासन हर साल कालिंजर महोत्सव का भी आयोजन करता है, उस समय वहां सैलानियों की खासी भीड़ रहती है। पर्यटकों की आमद को देखते हुए कालिंजर में अब अलग-अलग बजटों के कई बढि़या होटल भी खुल गए हैं।

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