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		<title>नंद के लाल की खुशी में हो जाइए आप भी शामिल- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Sep 2010 09:35:59 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[कल यानी 2 सितम्बर को कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी के दिन जन्माष्टमी मनाई जा रही है. जन्‍माष्‍टमी के त्‍यौहार में भगवान विष्‍णु की, श्री कृष्‍ण के रूप में, उनकी जयन्‍ती के अवसर पर प्रार्थना की जाती है. हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार कृष्‍ण का जन्‍म, मथुरा के असुर राजा कंस का अंत करने के लिए [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: medium;">कल यानी 2 सितम्बर को कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी के दिन जन्माष्टमी मनाई जा रही है. जन्‍माष्‍टमी के त्‍यौहार में भगवान विष्‍णु की, श्री कृष्‍ण के रूप में, उनकी जयन्‍ती के अवसर पर प्रार्थना की जाती है. हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार कृष्‍ण का जन्‍म, मथुरा के असुर राजा कंस का अंत करने के लिए हुआ था. कृष्ण ने ही संसार को “गीता” का ज्ञान भी दिया जो हर इंसान को भय मुक्त रहने का मंत्र देती है. इस उत्सव में कृष्‍ण के जीवन की घटनाओं की याद को ताजा करने व राधा जी के साथ उनके प्रेम का स्‍मरण करने के लिए <strong>रास लीला</strong> की जाती है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong><a href="http://www.jagranyatra.com/%E0%A4%AB%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A5%8B-%E0%A4%97%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A4%B0%E0%A5%80/?album=7&amp;gallery=31"><img class="alignleft size-medium wp-image-6819" title="Mathura Vrindavan" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/09/14-300x200.jpg" alt="" width="300" height="200" /></a>मथुरा का सौन्दर्य </strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong><br />
</strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;">जन्माष्टमी वैसे तो पूरी भारत में पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है लेकिन कृष्ण के अपने घर यानी मथुरा में इसकी उमंग का रंग देखते ही बनता है. यहां का जन्माष्टमी उत्सव इतना प्रसिद्ध है कि विदेशों से लोग खास इसे देखने आते हैं. मथुरा में ही भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान पर मंदिर है जहां कृष्ण भगवान ने द्वापर युग में जन्म लिया था. इसके साथ ही जन्माष्टमी के उपलक्ष्य में मथुरा में गौरांग लीला और रामलीला होती है और ठाकुरजी के नए वस्त्रों को तैयार किया जाता है. मान्यता है कि ठाकुर जी का श्रृंगार सभी देवों से अदभुत होता है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">मथुरा में इस दिन इतनी भीड़ होती है कि प्रशासन को काबू करने के लिए पुलिस बल का भी प्रयोग करना पडता है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/09/9.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6820" title="Mathura Vrindavan" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/09/9-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>गोविंदा आला रे आला </strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong><br />
</strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;">जन्माष्टमी भारत के हर हिस्से में मनाई जाती है. मथुरा के अलावा मुबंई की जन्माष्टमी भी बहुत लोकप्रिय है. महाराष्‍ट्र में जन्‍माष्‍टमी के दौरान मिट्टी की मटकियों में दही व मक्‍खन डालकर उन्हें चुराने की कोशिशों करने का(जैसा कृष्ण अपने बचपन में करते थे) उल्‍लासपूर्ण अभिनय किया जाता है. इन वस्‍तुओं से भरा एक मटका जमीन से ऊपर लटका दिया जाता है तथा युवक व बालक इस तक पहुंचने के लिए मानव पिरामिड बनाते हैं और अन्‍तत: इसे फोड़ डालते हैं.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/09/last.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6821" title="Krishna Ashtami Puja at Mathura Vrindavan" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/09/last-300x214.jpg" alt="" width="300" height="214" /></a>जन्माष्टमी पूजन विधि</strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong><br />
</strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;">श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्ररूप में हुआ था. ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी का सफल पूजन करने से मनुष्य का कल्याण होता ही है. भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अर्द्धरात्रि में हुआ था इसलिए इस दिन सुबह से लेकर रात्रि तक श्रीकृष्ण भक्ति में हर कोई डूब जाता है. इसी पवित्र तिथि पर बताई जा रही है भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित व्रत और पूजा की सरलतम विधि. आप भी भगवान की पूजा करें और ध्यान करें.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">सबसे पहले सुबह स्नान करने के बाद सभी देवताओं को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर में मुख कर श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का संकल्प करें. फिर  अक्षत यानी पूरे चावल के दाने पर कलश स्थापना कर माता देवकी और श्रीकृष्ण की सोने, चांदी, तांबा, पीतल, मिट्टी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. इनकी यथा विधि से पूजा करें या योग्य ब्राह्मण से कराएं. पूजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी आदि के नाम उच्चारण करना चाहिए. अंत में माता देवकी को अर्ध्य दें, भगवान श्री कृष्ण को पुष्पांजलि अर्पित करें. रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के बाल रुप प्रतिमा की पूजा करें. रात में श्रीकृष्ण स्तोत्र, गीता का पाठ करें. दूसरे दिन स्नान कर जिस तिथि एवं नक्षत्र में व्रत किया हो, उसकी समाप्ति पर व्रत पूर्ण करें. इस दौरान आप इस मंत्र का जाप जब भी समय मिले करते रहें <strong>“</strong><strong>ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:</strong><strong>’’</strong><strong>. </strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong><br />
</strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong>हमारी तरफ से आपको जन्माष्टमी की ढेरों बधाइयां. </strong></span></p>
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		<title>टिप्स : कैसे बनाएँ अपनी ट्रेन यात्रा को खुशहाल</title>
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		<pubDate>Fri, 27 Aug 2010 11:04:54 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[भारतीय रेल एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है जिसकी लम्बाई 63,327 किलोमीटर से अधिक है जो 6909 स्टेशनों से गुज़रती है और जिसमें करीबन दो करोड़ यात्री प्रति दिन यात्रा करते हैं. आश्चर्य होता है ना कि इतनी विशाल प्रणाली वास्तव में कैसे काम करती है. सोचिए नहीं वरना चक्कर आ जाएगा. आप तो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: medium;">भारतीय रेल एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है जिसकी लम्बाई 63,327 किलोमीटर से अधिक है जो 6909 स्टेशनों से गुज़रती है और जिसमें करीबन दो करोड़ यात्री प्रति दिन यात्रा करते हैं. आश्चर्य होता है ना कि इतनी विशाल प्रणाली वास्तव में कैसे काम करती है. सोचिए नहीं वरना चक्कर आ जाएगा. आप तो बस अपनी यात्रा का आनंद उठाइए परन्तु इन सात बातों का ध्यान ज़रूर रखें.</span><br />
<span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<ol>
<li><span style="font-size: medium;">ट्रेन यात्रा करते समय अपने साथ छुट्टा पैसा ज़रूर रखें क्योंकि पता नहीं आपको कब क्या खाने का मन कर जाए. चाय, काफ़ी, समोसा, नमकीन आपके सफर में बहुत सारे सामान बेचने वाले मिलेंगे अतः अगर आप छुट्टे पैसे रखेंगे तो यह सामान खरीदने में आसानी होगी. </span></li>
<p></p>
<li><span style="font-size: medium;">अगर आप को रात में देर तक पढ़ने की आदत है तो अपना आरक्षण वातानुकूलित(एसी) दो स्तरीय या प्रथम श्रेणी के वातानुकूलित डिब्बे में करवाएं क्योंकि अधिकांश यात्रियों को 10:00 बजे बाद रोशनी बंद करके सोने की आदत होती है अतः आपको पढ़ने में परेशानी होगी. </span></li>
<p></p>
<li><span style="font-size: medium;">यात्रा करते समय सामान की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है. इसके लिए ज़रुरी है कि अपने सामान को अपनी सीट के नीचे चेन से बांध कर रखें.</span></li>
<p></p>
<li><span style="font-size: medium;">अगर आप अकेले यात्रा कर रहे हैं तो आपकी प्राथमिकता ऊपरी या निचले बर्थ की होनी चाहिए जिससे आपको खिड़की की सीट भी मिल जाएगी और आपको ज़्यादा लोग तंग भी नहीं करेंगे.</span></li>
<p>
<li><span style="font-size: medium;">किसी भी अंजान व्यक्ति से कोई भी चीज़ खाने या पीने की ना ग्रहण करें.</span></li>
<p>
<li><span style="font-size: medium;">अपने साथ एक अच्छा इयरफ़ोन रखें जिससे आप अपना मनपसंद संगीत सुन सके और दूसरी चिल्लपों से भी बचे रहें. </span></li>
</ol>
<p><span style="font-size: medium;"></p>
<p></span></p>
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		<title>सुरक्षित हवाईजहाज यात्रा</title>
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		<pubDate>Thu, 26 Aug 2010 07:05:04 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[हवाईज़हाज़ से सफ़र करना दूसरे साधनो की बजाय ज़्यादा सेफ समझा जाता है क्योंकि यह सामान्य, सेफर तथा हेल्दी एन्वाइरन्मेंट मे होता है, लेकिन सफ़र करने से पहले आपको चाहिए कि जिस एयरलाइन मे आप ट्रेवलिंग करने वाली हैं उनकी गर्भवती महिलाओं के लिए क्या पॉलिसीज हैं जहाँ एक ओर कुछ एयरलाइन अठाईस्वें हफ्ते तक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: medium;">हवाईज़हाज़ से सफ़र करना दूसरे साधनो की बजाय ज़्यादा सेफ समझा जाता है क्योंकि यह सामान्य, सेफर तथा हेल्दी एन्वाइरन्मेंट मे होता है, लेकिन सफ़र करने से पहले आपको चाहिए कि जिस एयरलाइन मे आप ट्रेवलिंग करने वाली हैं उनकी गर्भवती महिलाओं के लिए क्या पॉलिसीज हैं जहाँ एक ओर कुछ एयरलाइन अठाईस्वें हफ्ते तक आपको ट्रेवलिंग करने की अनुमति देती है वहीं कुछ का मानना है की छत्तीसवे हफ्ते तक कोई कॉंप्लिकेशन्स नहीं होती हैं सभी एयरलाइन्स का पेपरवर्क अलग हो सकता है इसलिए किसी को भी चुनने से पहले अच्छी तरह रिसर्च कर लें और फिर निर्णय लें।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"> </span></p>
<p><span style="font-size: medium;">हाई रिस्क प्रेग्नेन्सी वाली महिलाओं को किसी से भी ट्रेवलिंग करने की अनुमति नही है, साथ ही याद रहे कि टिकट बुक करते समय एयरलाइन कंपनी आपके डॉक्टर से एक सर्टिफिकेट मांगती हैं जिसमे आपकी ड्यू डेट और हेल्थ कंडीशन की जानकारी होती है।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"> </span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong>सही सीट का चुनाव करें</strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;"> </span></p>
<p><span style="font-size: medium;">ऐसी सीट का चुनाव करें जो आराम दायक तो हो ही साथ ही लेग स्पेस भी काफ़ी हो जिसमे आप आराम से खुलकर अपनी स्ट्रेचिंग एक्सार्साइज़ कर सकें और अपने से यात्रियों को बिना डिस्टर्ब करे वॉशरूम आराम से जा सकें, एक ही पोस्चर मे ना बैठी रहें और हो सके तो पोस्चर्स बदलाव करती रहें इससे आपकी बॉडी मे ब्लड सर्क्युलेशन सुचारू रूप से चलता रहेगा और अगर आप थोडा सा चलना चाहती हैं तो इसके लिए पहले एयर होस्टेस को ज़रूर बता दें, अगर आप ज़्यादा आरामदायक सीट और प्राइवेसी चाहते हैं तो आप बिज़नेस क्लास सीट्स बुक कर सकते हैं, बैठे बैठे कलाइयाँ घुमाना, टखने मूव करना आदि अच्छी स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज हैं, कुछ एयरलाइन्स ऐसी होती हैं जहाँ सीट फर्स्ट कम फर्स्ट सर्व की बेसिस पर मिलती हैं, इसलिए जल्दी ही एयरपोर्ट पहुँचने की कोशिश करें, बल्कि अगर हो सके तो थोड़ी सी एक्सट्रा फीस देकर सीट पहले ही रिज़र्व करवा लें ।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<ul>
<li><span style="font-size: medium;"><strong>सीट बेल्ट्स बांधें-</strong><strong> </strong>जब भी एयर होस्टेस आपसे सीट बेल्ट बाँधने को कहे तो सीट बेल्ट ज़रूर लगायें, कभी कभी खराब मौसम के कारण पाइलट पहले ही बता देता है कि आगे उबड़ खाबड़ रास्ता है और ढ़चके लग सकते हैं तो अपनी सीट लगा लीजिए, इसीलिए किसी भी प्रकार की असावधानी से तौबा करें और सीट बेल्ट ज़रूर लगायें ।</span></li>
</ul>
<ul>
<li><span style="font-size: medium;"><strong>मेक स्मार्ट फूड चॉयस-</strong> एयरलाइन्स मे सफ़र करते समय आपकी रॉ फूड दिया जाता है जैसे सलाद, कटे हुए फल वगैरह जिनमे कच्चा अंडा जैसे मायोनिस आदि पदार्थ होते है जिनसे फुड पाय्ज़निंग तथा इन्फेक्शन हो सकता है इसलिए इनसे परहेज़ करें, हो सके तो खूब पानी पीयें और चाय या कॉफी कम से कम पीयें, थोड़ी थोड़ी देर मे हॉट <strong>फूड</strong></span> की छोटी छोटी <span style="font-size: medium;">मील्स लेते रहें ।</span></li>
</ul>
<ul>
<li><span style="font-size: medium;"><strong>सफ़र करते समय रिलैक्स रहें-</strong> बहुत से लोगों मे देखा जाता है कि वह फाइट के टेक ऑफ तथा लॅंडिंग के समय घबरा      जाते हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल ना करें, एयरलाइन मे आपके लिए ऑक्सीजन का पूरा बंदोबस्त होता है भले ही आपकी फ्लाइट कितनी ही उँचाई पर उड़े आपको साँस लेने मे कोई      परेशानी नही होती, अगर आप दर रही हैं कि एयरपोर्ट पर मौजुद मेटल डिटेक्टर आपके बच्चे को नुकसान पहुँचा सकते हैं तो परेशान मत होए क्योंकि यह बिल्कुल      सेफ होते हैं, इसीलिए एयरलाइन मे सफ़र करते हुए बिल्कुल रिलॅक्स रहें और आराम करें ।</span></li>
</ul>
<p><span style="font-size: medium;">एयरलाइन मे सफ़र करते समय टेंप्रेचर बदलता रहता है जिसमे आप तो अडजस्ट कर सकती हैं लेकिन शायद यह आपके पैरों को गवारा नही होता और वह सूज सकते हैं, इसलिए कम्फर्टेब्ल शूज पहने जिनमें आपके सूजे हुए पैरों के लिए भी जगह रहे ।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">SOURCE: http://www.onlymyhealth.com/ </span></p>
<p><span style="font-size: medium;"> </span></p>
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		<title>भुवनेश्वर मंदिरों व इतिहास की नगरी</title>
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		<pubDate>Wed, 25 Aug 2010 13:08:08 +0000</pubDate>
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भुवनेश्वर बाहर से नया है किंतु भीतर से यह पनचीन नगरी है। भारत में शायद ही अन्य ऐसा कोई नगर हो जहां विभिन्न कालखंडों में बने इतने स्मारक देखने को मिलते हों। यदि संजीदगी से देखें यहां के कोने-कोने में मौजूद मंदिरों, गुफाओं व शिलालेखों के रूप में इतिहास बिखरा पडा है। पश्चिम में धौली [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: medium;"><strong> </strong></span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><strong>भुवनेश्वर </strong>बाहर से नया है किंतु भीतर से यह पनचीन नगरी है। भारत में शायद ही अन्य ऐसा कोई नगर हो जहां विभिन्न कालखंडों में बने इतने स्मारक देखने को मिलते हों। यदि संजीदगी से देखें यहां के कोने-कोने में मौजूद मंदिरों, गुफाओं व शिलालेखों के रूप में इतिहास बिखरा पडा है। पश्चिम में धौली पहाडी के आधार पर सवा दो हजार साल पुराने अशोक कालीन शिलालेख व चिन्ह मौजूद हैं तो शहर के पूर्वी भाग में खंडगिरी व उदयगिरी की पहाडियों में 2 हजार साल पहले बनी जैन सन्यासियों की गुफाएं। इसी नगर के पुराने हिस्से में 700 से 1300 साल पूर्व बने अनेकानेक मंदिर है। पनचीन व मध्यकालीन इन संरचनाओं के अलावा <a href="http://www.jagranyatra.com/2010/03/cultural-religious-orissa/" target="_blank"><span style="font-size: large;">भुवनेश्वर</span></a> में नन्दनकानन पनणी उद्यान, शान्ति स्तूप, रवींदन् मण्डप, साइन्स सेन्टर, राज्य संगन्हालय आकर्षण के रूप में उभरे हैं।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">भुवनेश्वर भी कभी एक पन्सिद्ध मन्दिर नगरी थी। कहा जाता है कि एक समय यहां 7000 मन्दिर थे लेकिन समय की मार, आक्रांताओं के हमलों, उपेक्षा व उचित रखरखाव के अभाव में एक के बाद एक मंदिर जमींदोज होते चले गए। भुवनेश्वर में उस काल के अवशेष मंदिर उडीसा ही नहीं बल्कि भारत की उत्तर मध्य व मध्यकालीन शिल्पकला व स्थापत्य कौशल का दिग्दर्शन कराते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/anant-vasudev.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6730" title="anant vasudev" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/anant-vasudev-199x300.jpg" alt="ANANAT VASUDEVA" width="199" height="300" /></a>कलिंग की इस धरती ने सत्ता संघर्ष की पराकाष्ठा को बेहद निकट से देखा है। पहली शती से सातवीं शती के मध्य कलिंग के इतिहास का बहुत धुंधला सा है। लेकिन अलग-अलग दौर में अनेक शासकों का यहां राज रहा। ईसा पूर्व पहली शती में कलिंग में छेदी सामनज्य का उद्भव हुआ जो जैन धर्म के अनुयायी थे। इस काल के तीसरे नरेश खरवीला का शासन उल्लेखनीय है जिस दौरान यहां खंडगिरी व उदयगिरी की पहाडियों में बनी जैन सन्यासियों की गुफाएं बननी आरंभ हुई। दूसरी शती में यहां पर सातवाहन राजाओं के शासन का उल्लेख मिलता है। तीसरी शती में कुषण व नागवंशियों ने भी कलिंग के कुछ हिस्से पर शासन किया। उसके उपरांत समुदन्गुप्त ने इस राज्य को अपने अधीन किया। चौथी शती के अन्त तक यहां मराठा शासन रहा। जिनके बाद पांचवीं शती में यहां पर पूर्वी गंग नरेशों का काल आया। लेकिन फिर समनट हर्षव‌र्द्धन ने इसे विजित किया। उनके बाद फिर बौद्ध धर्म के अनुयायी राजा भूमा रहे।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">इसके उपरांत कलिंग पर हिंदू राजाओं का पूरी तरह से अधिपत्य हुआ। आठवीं शती में हिंदू धर्म के पुनर्जागरण के बाद हर नरेश अपनी क्षमता व राज्य के संसाधनों से मंदिरों का निर्माण करवाता चला गया। आरंभ में एकामन्तीर्थ यानि भुवनेश्वर इसका केंदन् था। दसवीं शती के उत्तरा‌र्द्ध में कलिंग की धरती पर सोमवंशी राजवंश का उदय हुआ जिसके राजाओं ने 11वीं शती तक यहां अलग-अलग काल में राज किया। इस काल में भुवनेश्वर सत्ता का केन्दन् रहा और उनके काल में ही पुरी स्थित जगन्नाथ मन्दिर की आधारशिला रखी गई। हालांकि इसका निर्माण गंग नरेश अनंग भीमदेव द्वितीय के काल जाकर पूर्ण हुआ। पुरी के मंदिर परिसर में मंदिरों को विभिन्न राजाओं ने बनवाया। 11वीं शती में हुए ललातेन्दु केसरी ने भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर की आधारशिला रखी। 12वीं शती में फिर से कलिंग में गंग सामनज्य स्थापित हुआ जिन्होंने कलिंग में सोमवंशी सत्ता को उखाड फेंका। राजा नरसिंह देव इस वंश के राजा थे जिन्होंने कोणार्क में सूर्य मंदिर को बनवाया।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/raja-rani-temple.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6731" title="Raja Rani Temple" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/raja-rani-temple-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" /></a>पनचीन, उत्तर-मध्य और मध्यकालीन दौर में भुवनेश्वर में जो भी मंदिर निर्मित हुए उनकी कलात्मक, सुन्दरता व भव्यता किसी को मन्त्रमुग्ध करने को पर्याप्त है। इन पर लगा पन्त्येक पत्थर ऐसे लगा है मानो वह कुछ न कुछ बोल रहा हो। पुराने शहर में कई अन्य मन्दिर भी हैं जो पुराने हिस्से में बनी आवासीय कालोनियों के मध्य देखे जा सकते हैं। 7वीं शती से लेकर 13वीं शती का काल उडीसा में स्थापत्य व शिल्पकला का चरम काल माना जाता है। भुवनेश्वर के मंदिरों में वैसे तो रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर, शत्रुघ्नेश्वर, केदारेश्वर, सिद्धेश्वर, अनन्त वासुदेव, परशुरामेश्वर, मुक्तेश्वर, राजा-रानी, लिंगराज आदि हैं, किन्तु इनमें से अंतिम चार मन्दिर उल्लेखनीय हैं। इनमें से लिंगराज मन्दिर को छोड अन्य में आज पूजा-अर्चना नहीं होती है। ये मंदिर विभिन्न समयावधि में निर्मित हुए व अलग-अलग शैलियों के है। इनमें परशुरामेश्वर मन्दिर सबसे पनचीन मन्दिर समझा जाता है। इसका निर्माण 650 ई. में हुआ माना जाता है। यद्यपि इस मंदिर का 1903 में जीर्णाद्धार किया गया किन्तु मन्दिर का गर्भगृह मूल रूप में हैं। 950 ई. में निर्मित मुक्तेश्वर मन्दिर मध्यकालीन भव्य मन्दिरों का लघु रूप है। राजा-रानी मंदिर सुनने से लगता है कि इसका संबंध राजा-रानी से होगा किंतु ऐसा नहीं है। संभवत: इस मंदिर में लगे दो पन्कार के पत्थरों, जिनमें से एक लाल व दूसरा का नाम राजरणियां था, के कारण इसका लोकपिन्य नाम राजा-रानी हो गया। मंदिर का शिल्प दर्शनीय है।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/lingraj-temple.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6732" title="lingraj temple" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/lingraj-temple-300x199.jpg" alt="" width="300" height="199" /></a>उडीसा के चाहे आप जितने भी मन्दिर देख लें लेकिन यदि भुवनेश्वर का लिंगराज मन्दिर न देख पाएं तो कहा यहीं जाएगा कि भला आपने क्या देखा? लिंगराज मन्दिर एक विशाल मन्दिर होने के साथ स्थापत्य, शिल्प में अद्वितीय मन्दिर है। वस्तुत: यह आधा शिव व आधा विणु मन्दिर माना जाता है इसीलिए इसमें बेलपत्र व तुलसी के साथ पूजा होती हैं। मन्दिर परिसर के चारों ओर पत्थरों की ऊँची दीवार है। पहली बार देखने पर हर कोई इसकी भव्यता से दंग रह जाता है। इस पर जितनी बारीकी से काम हुआ है वैसी आज कल्पना ही की जा सकती है। मन्दिर के बाहर कई देवों की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर परिसर में ही लगभग छोटे-बडे 150 अन्य मंदिर हैं।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">इन मन्दिरों के अलावा भुवनेश्वर में रामेश्वर, अनन्त वासुदेव मन्दिरों को भी देखा जा सकता है। यहां से 16 किमी दूर हीरापुर में 64 योगिनी मंदिर भी देखने लायक है। भुवनेश्वर में खंडगिरी-उदयगिरी की पहाडियों पर जैन सन्यासियों की गुफाएं दर्शनीय हैं। ये गुफाएं चट्टानों को खोदकर बनाई गई हैं। इनमें से उदयगिरी में 18 गुफाएं है जबकि खण्डागिरी में 15 छोटी-बडी गुफाओं के अलावा जैन मन्दिर है। उदयगिरी की गुफाओं में हाथीगुफा व रानीगुफा उल्लेखनीय हैं। भुवनेश्वर-पुरी मार्ग पर धौलीगिरी में कुछ बहुत नया है तो कुछ बहुत पनचीन। इस पहाडी के एक ओर दया नदी है जिसके किनारे कलिंग व मगध की सेनाओं के बीच भंयकर युद्ध हुआ था। पहाडी के आधार पर अशोककालीन आदेश आज भी देखे जा सकते हैं। इसके समीप पत्थरों पर तराशा गया हाथी का मुख है जो इंगित करता है कि अशोक के काल में शिल्प कला कितनी उन्नत रही होगी। पहाडी पर एक विशाल विश्व शान्ति स्तूप है। इसका निर्माण 1973 में किया गया था। स्तूप के चारों ओर अलग-अलग मुदन में बुद्ध की चार मूर्तिया हैं। स्तूप में जातक कथाओं से संबंधित पन्संग पत्थरों पर उकेरे हैं। भुवनेश्वर में पर्यटन अभिरुचि के अन्य स्थानों में नन्दनकानन पनणी उद्यान भी जो शहर से 20 किमी की दूरी पर है। यह चिडियाघर एक विशाल क्षेत्रफल में है जो पनकतिक रूप से यहां के जानवरों के लिए पन्सिद्ध है। यह उद्यान सफेद बाघों के लिए भी पन्सिद्ध है। इसके अतिरिक्त यहां पर कई अन्य वन्य जन्तुओं भी देखा जा सकता है। भुवनेश्वर का राज्य संगन्हालय भी दर्शनीय है। भुवनेश्वर देश के हर भाग से सीधी रेल सेवा व विमान सेवा से जुडा है। राजधानी है होने से हर पन्कार की आधुनिक सुविधाएं यहां मौजूद हैं। हरेक पन्कार के पर्यटक के लिए यहां पर सुविधाएं हैं। नगर की सैर के लिए उडीसा पर्यटन विकास कॉरपोरेशन पैकेज टूर चलाता है। इसमें आप शहर के खास-खास स्थान देख सकते हैं। आप चाहें तो अलग से भी योजना बना कर घूम सकते हैं।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"> </span></p>
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		<title>केरल – शांति और ईश्वर का निवास</title>
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		<pubDate>Wed, 25 Aug 2010 12:26:32 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[महानगर की भाग-दौड और कोलाहल से दूर केरल में हमारा पहला पडाव था एर्नाकुलम। कोच्चि से सटे इस छोटे लेकिन बेहद अहम् शहर में फैमिली फ्रेंड वासु के यहां ठहरना हुआ। केरल की विशुद्ध संस्कृति से रू-ब-रू होने का यह पहला मौका था। डोसा, सांबर, कडाला कढी (काले चने की तरीदार सब्जी), स्वीट डिश के तौर पर पायसम (चावल, दूध और नारियल से बनी खीर), उबला [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: medium;"><strong>महानगर</strong> की भाग-दौड और कोलाहल से दूर केरल में हमारा पहला पडाव था एर्नाकुलम। कोच्चि से सटे इस छोटे लेकिन बेहद अहम् शहर में फैमिली फ्रेंड वासु के यहां ठहरना हुआ। केरल की विशुद्ध संस्कृति से रू-ब-रू होने का यह पहला मौका था। डोसा, सांबर, कडाला कढी (काले चने की तरीदार सब्जी), स्वीट डिश के तौर पर पायसम (चावल, दूध और नारियल से बनी खीर), उबला हुआ मीठा केला और उसके बाद गरमा-गरम कॉफी.. पारंपरिक माहौल के बीच मलयाली खाने ने सफर की सारी थकान जैसे छूमंतर कर दी और केरल में हमारा पहला ही दिन ऊर्जादायक साबित हुआ। पेट-पूजा के बाद कोच्चि दर्शन का मन हुआ तो मौसम की तपिश व उमस भी आडे नहीं आई और जोश से भरे हम निकल पडे पुराने कोच्चि शहर की ओर. स्थानीय लोग इसे फोर्ट कोच्चि भी कहते हैं। पुर्तगाली शैली के खूबसूरत घर, नारियल के पेड और हिप्पी संस्कृति की झलक लिए कोच्चि के बीचों-बीच से गुजरते पहुंचे कोच्चि पोर्ट।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Boat-ride.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6719" title="Boat ride" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Boat-ride-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>कोच्चि में देखने के लिए ऐतिहासिक महत्व की कई जगह हैं, जैसे सेंट फ्रांसिस चर्च, मत्तनचेरी पैलेस म्यूजियम और ज्यूइश चर्च। ये सब देखने के बाद हम आ पहुंचे वास्को-दा-गामा चौराहे पर। मछुआरों के इस शहर में आकर यहां स्थानीय मछुआरों को चायनीज फिशिंग नेट्स यानी चीनी जाल की मदद से मछली पकडते देखना अलग ही अनुभव रहा। चीनी जाल केरल के मछुआरों की रोजी-रोटी का मुख्य साधन हैं। ये जाल काफी पुराने और तकनीकी हैं। माना जाता है कि चीन के शासक कुबलई खान के दरबार से जेंग हे नाम का एक चीनी यात्री इन्हें कोच्चि लेकर आया था।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">इसके बाद हमने रुख किया नजदीक ही लगे फुटपाथ बाजार का। इस बाजार में आकर लगा जैसे हम दिल्ली के जनपथ मार्केट में आ गए हों। यहां ऐसी कई चीजें मिल जाएंगी जो आपको केरल की याद दिलाती रहेंगी<span style="font-size: large;">।</span><span style="font-size: large;"><span style="font-size: large;"><a href="http://www.jagranyatra.com/2010/04/kerala-tourism-tourist-fu/" target="_blank">केरल</a></span> </span>में आपको भाषाई समस्या आडे नहीं आएगी क्योंकि यहां लोगों का अंग्रेजी ज्ञान अच्छा है और आम लोग भी अंग्रेजी या काम-चलाऊ हिंदी में बातचीत कर लेते हैं। फोर्ट कोच्चि के अलावा यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर वायपिन आयलैंड जरूर जाएं। यहां चेरई बीच है। ये बीच काफी साफ-सुथरा और तैराकी के लिए माकूल है। अगर आप घूम-फिर कर थक गए हैं तो यहां पर कुछ देर सुस्ता लें।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Munnar-Lake.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6721" title="Munnar Lake" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Munnar-Lake-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>हमारा अगला और प्रमुख पडाव था मुन्नार। प्रमुख इसलिए क्योंकि मेरे जहन में जब-जब भी केरल की तस्वीर उभरी है, बैकवॉटर्स के बाद दूसरा और सबसे खूबसूरत नजारा मुन्नार का ही रहा है। केरल के इडुक्की जिले में है मुन्नार। यह जाना-माना हिल स्टेशन है और हाल ही में इसे एशिया में जापान के टोक्यो के बाद सबसे अच्छे पर्यटन केंद्र का दर्जा मिला है। कुदरती खूबसूरती, दूर-दूर तक फैले चाय के बागान और लुभावना मौसम. यही है मुन्नार की खासियत। मुन्नार में कदम रखते ही आप शर्तिया बेहद तरो-ताजा महसूस करेंगे। बेहतर होगा कि मुन्नार की सैर के लिए टैक्सी करने की बजाय आप ऑटो-रिक्शा को ही चुनें। इससे बचत तो होगी ही, आप खुद को कुदरत के ज्यादा करीब भी महसूस करेंगे। हमारे ड्राइवर मणि ने हमें 800 रुपए में न सिफर् पूरा दिन ऑटो-रिक्शा में घुमाया बल्कि स्थानीय जडी-बूटियों और जीव-जंतुओं से जुडी कई दिलचस्प जानकारियां भी हमें दीं। मुन्नार में कई तरह के फल-फूल पाए जाते हैं, और यहां का एक खास फल है &#8211; पैशन फ्रूट। यह फल काफी सस्ता होता है और आसानी से हर जगह मिल जाता है। मुन्नार में ही मुझे पहली बार काजू, कॉफी और इलायची के पौधे देखने को मिले। मणि ने बताया कि काजू का फल आप खा भी सकते हैं, तो मौका न गंवाते हुए मैंने इसे चख लिया। बेहद खूबसूरत दिखने वाले काजू के फल का स्वाद मुझे काफी कसैला लगा, लेकिन स्थानीय शहद चखने के बाद मुंह का स्वाद एक बार फिर बदल गया।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Elephant-safari.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6722" title="Elephant safari" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Elephant-safari-225x300.jpg" alt="" width="225" height="300" /></a>अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और पहाडों के हसीं मौसम का जमकर लुत्फ उठाना चाहते हैं तो कम-से-कम 4-5 दिन मुन्नार में जरूर ठहरें। मुन्नार में चारों तरफ हरियाली की चादर बिछी है तो यहाँ की साफ-सुथरी सडकों पर आपको कभी-कभार झूमते-इठलाते हाथी भी दिखाई दे जाते हैं। अब यह नजारा किसी शहर में तो मुमकिन नहीं है। वैसे भी मुन्नार में आकर अगर आप हाथी के साथ जंगल की सफारी पर नहीं गए तो अपनी यात्रा अधूरी समझिए। मुन्नार शहर से दो किलोमीटर की दूरी पर है टाटा टी म्यूजियम। टी म्यूजियम में आप चाय-पत्ती तैयार किए जाने की पूरी प्रक्रिया शुरू से आखिर तक देख सकते हैं। इतना ही नहीं, अपनी आंखों के सामने तैयार की गई चाय की चुस्कियां भी ले सकते हैं। मुन्नार की एक और खासियत है- वो है यहां उगने वाला नीलकुरुंजी नाम का एक खूबसूरत फूल। लेकिन इसे देखने के लिए आपको भी मेरी तरह वर्ष 2018 तक इंतजार करना होगा क्योंकि ये फूल 12 साल में सिफर् एक ही बार खिलता है।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">अगले दिन बारी थी केरल की एक और खासियत से रू-ब-रू होने की, सो अल-सुबह हम रवाना हो गए कोल्लम के लिए। 250 किलोमीटर का यह सफर हमने राज्य परिवहन की बस में तय किया। इस सफर के दौरान एक चीज बहुतायत में दिखी, और वो थे कटहल के पेड। पूरे केरल में इसकी पैदावार काफी अच्छी है। करीब 10 घंटे के सफर के बाद हम कोल्लम पहुंचे। कोल्लम से हमने अष्टमुडी में अपने रिजॉर्ट का रुख किया जो वहां से करीब 15 किलोमीटर दूर था। सफर की थकान मिटाने और कुछ देर फुर्सत से सुस्ताने के लिए आयुर्वेदिक मसाज से अच्छा विकल्प भला क्या हो सकता था, सो हमने फौरन एक आयुर्वेदिक थेरेपिस्ट से संपर्क किया और हमारे अगले 2 घंटे सुकून और ताजगी से भरे थे. आयुर्वेदिक मसाज के एक सेशन की शुरुआती कीमत है करीब 500 रुपये जो तेल और उसकी क्वालिटी के साथ हजारों रुपये तक पहुंच सकती है। आप सादे आयुर्वेदिक तेल से मसाज की सुविधा चाहते हैं या खास किस्म के खुशबूदार तेलों के साथ, यह पूरी तरह से आप पर निर्भर है।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">मसाज के अलावा केरल अपने बैकवॉटर्स के लिए दुनिया भर में मशहूर है। अष्टमुडी में अगर आप बैकवॉटर्स का असल लुत्फ उठाना चाहते हैं तो केरल टूरिज्म की नौका यात्रा बेहतर विकल्प है। महज 400 रुपये में आप 5 घंटे तक केरल की असली खूबसूरती को निहार सकते हैं, वो भी बेहद करीब से। कोल्लम बस स्टैंड से चलने वाली सरकारी बस सैलानियों को मुनरो आयलैंड तक ले जाती है, और इसी आयलैंड से आगाज होता है एक बेहद रोमांचक सफर का। बस से उतरकर आप एक छोटी नौका में सवार होते हैं और बैकवॉटर्स में धीरे-धीरे सरकती यह नौका अलग ही दुनिया में ले जाती है।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Fishermen-boat.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6723" title="Fishermen boat" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Fishermen-boat-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" /></a>नौका यात्रा के दौरान हमें केरल के खालिस ग्रामीण जीवन और यहां की जैवीय विविधता को करीब से महसूस करने का मौका मिला। पानी की संकरी सडक पर गुजरते हुए हम मुनरो गांव की तरफ बढ रहे थे। हमारे साथ नौका में कुछ विदेशी मेहमान भी सवार थे। नौका चलाने वाले मल्लाह चिदंबरम ने हमें मुनरो गांव के अंदर चलने को कहा। कुछ दूर पैदल चलकर हम मछुआरों की बस्ती में जा पहुंचे जहां हमने कारीगरों को नौकाएं बनाते हुए देखा। इसके बाद चिदंबरम हमें नारियल के पेडों के झुरमुट में ले गया जहां हमने ताडी बनाते हुए देखी। नारियल के फूल से तैयार ताजा ताडी उतरते देख हमारा मन इसे पीने को हुआ तो गांव वालों को भी जैसे मेहमानवाजी का मौका मिल गया और उन्होंने झट से हमारे सामने ताडी से भरे गिलास पेश कर दिए।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Pineapple.jpg"><img class="alignleft size-medium wp-image-6725" title="Pineapple" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/Pineapple-225x300.jpg" alt="" width="225" height="300" /></a>बैकवॉटर्स से गुजरते हुए हमने आस-पास रोज-एप्पल और अनानास के कई पौधे देखे। रोज-एप्पल एक स्थानीय फल है जो खाने में रसीला और कुछ-कुछ सेब जैसा स्वाद लिए हुए होता है। अगर आप खुशकिस्मत हैं तो नौका की सवारी के दौरान आपको कई ऐसी चीजें देखने को मिल सकती हैं जिन्हें आपने पहले कभी नहीं देखा होगा। कोल्लम से 5 किलोमीटर की दूरी पर है थंगासेरी लाइट-हाउस। 144 फुट ऊंचा ये लाइट हाउस एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा लाइट हाउस है जो शाम के समय सैलानियों के लिए खुला रहता है।कभी पुर्तगाली, डच और ब्रिटिश शासन के अधीन रह चुके थंगासेरी में चर्च और पुर्तगाली किले के कुछ अवशेष हैं जिन्हें देखकर आप इतिहास की गलियों में खो जाएंगे। स्थानीय भाषा में थंगासेरी का मतलब है- सोने का गांव। यहां किसी जमाने में लोग मुद्रा के तौर पर सोने का इस्तेमाल किया करते थे। इस लाइट हाउस की सबसे ऊपरी मंजिल से थंगासेरी और कोल्लम का खूबसूरत नजारा मेरी आंखों में अभी तक बसा हुआ है। कोल्लम के मुख्य बाजार में चारों तरफ खास तरह की सजावट और चहल-पहल देखने को मिली। पूछने पर पता चला कि यहां पारंपरिक त्योहार विशू धूमधाम से मनाया जा रहा था। विशू केरल का बडा त्योहार है और इस दौरान यहां पूरे 10 दिन तक कई तरह के सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। लेकिन इस उत्सव का जो खास आकर्षण है वो है सजे-संवरे हाथियों की झांकी और पारंपरिक कथकली नृत्य। इसी उत्सव का हिस्सा बनने के लिए हम पहुंचे कोल्लम के कृष्ण आश्रम मंदिर। कहा जाता है कि यह मंदिर 1000 साल से भी ज्यादा पुराना है। जब भी केरल जाएं, कथकली को अपनी कार्यक्रम-सूची में जरूर शामिल करें।</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">लौटकर हम चल पडे तिरुवनंतपुरम की ओर। केरल में सात दिन के प्रवास के दौरान हमने स्थानीय बसों में घुमक्कडी का खूब मजा लिया। तिरुवनंतपुरम हमारा आखिरी पडाव था। यह एक छोटा लेकिन घूमने लायक शहर है। वक्त की कमी के चलते हम शहर से कुछ ही दूरी पर स्थित शंखमुखम बीच ही जा सके.. तिरुवनंतपुरम से करीब 54 किलोमीटर दूर है वरकला का खूबसूरत समुद्र तट, जिसे देखने की हसरत दिल में ही रह गई। फिलहाल केरल की हसीन यादों को अपने दिलो-दिमाग और कैमरे में कैदकर ताजातरीन मूड के साथ मैं लौट आई हूं अपने ठिकाने पर।</span></p>
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		<title>केरल पर्व – ओणम (Onam Indian Festival )</title>
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		<pubDate>Wed, 25 Aug 2010 06:22:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भारत एक रंग-बिरंगा देश है. यहां की भौगोलिक स्थिति जितनी रंगारंग है उतनी ही विविधता इसके त्योहारों में भी है. भारत के कोने-कोने में मनाएं जाने वाले सांस्कृतिक त्योहारों की रंगीन तस्वीर देखते ही बनती है.


इसी क्रम में केरल का ओणम त्योहार भी शामिल है. इस त्योहार की सबसे बडी विशेषता यह है कि इस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><span style="font-size: medium;">भारत एक रंग-बिरंगा देश है. यहां की भौगोलिक स्थिति जितनी रंगारंग है उतनी ही विविधता इसके त्योहारों में भी है. भारत के कोने-कोने में मनाएं जाने वाले सांस्कृतिक त्योहारों की रंगीन तस्वीर देखते ही बनती है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">इसी क्रम में केरल का ओणम त्योहार भी शामिल है. इस त्योहार की सबसे बडी विशेषता यह है कि इस दिन लोग मंदिरों आदि में पूजा-अर्चना नहीं करते, अपितु घर में ही पूजा की जाती है. इस पर्व के संदर्भ में कहा जाता है कि महाबली नाम से एक असुर राजा था केरल में और इसी के आदर में लोग ओणम मनाते हैं. लोग इसे फसल और उपज के लिए भी मनाते हैं. ओणम दस दिन के लिए मनाया जाता है. इस दौरान सर्पनौका दौड़ के साथ  कथकली नाच और गाना भी होता है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><a href="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/27juyp4k07.jpg"><img class="alignleft size-full wp-image-6711" title="27juyp4k07" src="http://www.jagranyatra.com/wp-content/uploads/2010/08/27juyp4k07.jpg" alt="" width="176" height="222" /></a>श्रावण मास की शुक्ल त्रयोदशी को मनाए जाने वाले इस त्यौहार को <strong>तिरू-ओणम</strong> भी कहा जाता है. श्रावण के महीने में ऐसे तो भारत के हर भाग में हरियाली चारों ओर दिखाई पड़ती है किन्तु केरल में इस महीने में मौसम बहुत ही सुहावना हो जाता है. फसल पकने की खुशी में लोगों के मन में एक नई उमंग, नई आशा और नया विश्वास जागृत होता है. इसी प्रसन्नता में श्रावण देवता और फूलों की देवी का पूजन हर घर में होता है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">ओणम के त्योहार से दस दिन पूर्व इसकी तैयारियां शुरू हो जाती हैं.  हर घर में एक फूल-गृह बनाया जाता है और कमरे को साफ करके इसमें गोलाकार रुप में फूल सजाए जाते हैं. इस त्योहार के पहले आठ दिन फूलों की सजावट का कार्यक्रम चलता है. नौवें दिन हर घर में भगवान विष्णु की मूर्ति बनाई जाती है. उनकी पूजा की जाती है तथा परिवार की महिलाएं इसके इर्द-गिर्द नाचती हुई तालियां बजाती हैं. इस नृत्य को <strong>थप्पतिकलि</strong> कहते हैं. रात को गणेशजी और श्रावण देवता की मूर्ति बनाई जाती है और सायं को पूजा-अर्चना के बाद मूर्ति विसर्जन किया जाता है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">ओणम को लोग विशेषकर इसकी नौका रेस के लिए जानते हैं. यह इसका सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है. नौका दौड़ को<a href="http://www.jagranyatra.com/2010/03/kerala-beaches-lakes-temples/" target="_blank"><span style="font-size: large;"> <strong>वल्लमुकलि</strong></span></a> कहते हैं. इस दौड़ में बड़ी-बड़ी लम्बी नौकाएं होती हैं और इन्हें चलाने वाले भी 20 से 40 तक व्यक्ति होते हैं.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">इस पर्व का एक खास व्यंजन भी होता है जिसे <strong>वल्लसन</strong> कहते हैं और यह हर घर में पकाया जाता है. इस दिन प्रातः भाप से पके हुए केले के पकवान खाए जाते हैं. इस नाश्ते को <strong>नेमद्रम</strong> कहते हैं. यह एक विशेष प्रकार का केला होता है, जो केवल केरल में ही पैदा होता है. अन्य त्योहारों का भांति इस त्योहार में भी बढ़िया-बढ़िया पकवान बनते हैं.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
<p><span style="font-size: medium;">इस पर्व को केरल सरकार एक पर्यटक त्योहार के रुप में मनाती है. इस दौरान केरल की सांस्कृतिक धरोहर देखते ही बनती है. ओणम के अवसर पर समूचा केरल नावस्पर्धा, नृत्य, संगीत, महाभोज आदि कार्यक्रमों से जीवंत हो उठता है. यह त्योहार केरलवासियों के जीवन के सौंन्दर्य को सहर्ष अंगीकार करने का प्रतीक है. यह त्योहार भारत के सबसे रंगा-रंग त्योहारों में से एक है.</span></p>
<p><span style="font-size: medium;"><br />
</span></p>
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		<title>मानसून में मन को क्यों मारे&#8230;.घूमें- फिरें और मस्ती करें</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Jul 2010 12:52:09 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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मानसून में अधिकतर लोग बाहर निकलने से बचते हैं. किसी को बाहर भीगने का डर लगता है तो किसी को सर्दी का डर लगता है. अधिकतर लोगों को बारिश में सिर्फ नहाना पसंद है. कहीं घूमने के नाम पर यह डर सताता है कि कहीं कीचड़ में सन गए या बारिश में फंस गए तो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size=3><br />
<img src="http://jagranyatra.jagranjunction.com/files/2010/07/MG_98521-300x232.jpg" alt="_MG_98521" title="_MG_98521" width="300" height="232" class="alignleft size-medium wp-image-95" />मानसून में अधिकतर लोग बाहर निकलने से बचते हैं. किसी को बाहर भीगने का डर लगता है तो किसी को सर्दी का डर लगता है. अधिकतर लोगों को बारिश में सिर्फ नहाना पसंद है. कहीं घूमने के नाम पर यह डर सताता है कि कहीं कीचड़ में सन गए या बारिश में फंस गए तो क्या होगा. पर बारिश में यह डर सिर्फ कुछ लोगों को लगता है कुछ के लिए तो बारिश होती ही घूमने के लिए है. बारिश की मस्ती में नहाने का अंदाज ही अलग होता है.<br />
<br />
मानसून में घूमने की तो बहुत सारी जगहें हैं लेकिन इस मौसम में ऐसे स्थानों का चुनाव अच्छा रहता है जहां ज्यादा बारिश न हो रही हो जैसे राजस्थान आदि. इसके साथ यह कहना भी गलत नहीं होगा कि केरल जैसे राज्यों में घूमने का सर्वोत्तम मौसम भी मानसून का ही है. आइए जानते हैं ऐसी ही जगहो के बारे में जहां बरसात में घूमने से मजा दुगना हो सकता है.<br />
<br />
<img src="http://jagranyatra.jagranjunction.com/files/2010/07/mon-300x225.jpg" alt="mon" title="mon" width="300" height="225" class="alignleft size-medium wp-image-97" /><strong>केरल भीगे मौसम में अलग ही है मजा </strong><strong> </strong><br />
<br />
केरल<strong> </strong>में घूमने का मजा तब और भी ज्यादा हो जाता है जब बरसात हो रही हो. केरल चारों तरफ से जंगल, नयनाभिराम पर्वत शिखर, वेगवती नदियां, समुद्री झीलें और ताल-तलैया, झरने और सुरम्य सागरतट तथा जबर्दस्त हरियाली से भरा-पूरा है. केरल को ऐसे मौसम में देख कर तो ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने अपनी पूरी हथेली यहां खोल दी हो. सागर तट हो या नदी की चाल हर तरफ पानी ही पानी.  इसके साथ ही आप केरल में पर्यटन के साथ स्वास्थ्य पर्यटन का भी लाभ उठा सकते हैं.<br />
<br />
<strong>भीमाशंकर</strong><strong></strong><br />
<br />
यह एक देवस्थल है जो अम्बेगांव जिले में मुम्बई से 265 किलोमीटर और पुणे से सौ किलोमीटर दूर है. यहां ‘ट्रैकर्स’ और शिवभक्तों की भीड़ रहती है. फिर भी यह एक शांत और दिल को खुश करने वाली जगह है. भक्ति और प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी इस जगह में रोमांच का तड़का भी है.<br />
<br />
<img src="http://jagranyatra.jagranjunction.com/files/2010/07/Goa-Beaches-9-300x204.gif" alt="Goa-Beaches-9" title="Goa-Beaches-9" width="300" height="204" class="alignleft size-medium wp-image-98" /><strong>गोवा </strong><strong></strong><br />
<br />
गोवा भारत का सबसे ज्यादा खूबसूरत समुद्र तट है. एक ऐसी जगह जहां देश के ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग घूमने आते हैं. अगर आप गर्मी में यहां जाएंगे तो भीड़ मजा खराब कर देगी और सर्दी में सर्द हवाएं इसलिए मानसून सबसे उपयुक्त मौसम है गोवा की सैर के लिए. गोवा के बेहतरीन बीच की लंबी कतार कलंगुट बीच से लेकर बागा बीच, मीरामार बीच, दोनापाउला और कोलवा बीच तक फैली है जहां मानसून के वक्त पर्यटक विशेष तौर पर आते हैं. लेकिन यह नहीं कि यहां मात्र समुद्र तट ही है बल्कि यह शहर अपने मशहूर चर्चों और मंदिरो के लिए भी प्रसिद्ध है.<br />
<br />
इसके साथ ही बरसात में आप तमिलनाडु, जयपुर, उदयपुर  जैसी जगहों पर भी घूमने जा सकते हैं. इन सब जगहों पर आप बरसात के सुहाने मौसम में जिस शांति की तलाश कर रहे हैं जरुर मिलेगी.<br />
<br />
यह तो बात हुई कि किन जगहों पर आपको घूमना फायदेमंद होगा इसके साथ ही आपके लिए हम कुछ यात्रा टिप्स भी दे रहे हैं जो आपके इस अनुभव को और मीठा बना देंगे.<br />
<br />
<img src="http://jagranyatra.jagranjunction.com/files/2010/07/composite11-300x288.jpg" alt="composite11" title="composite11" width="300" height="288" class="alignleft size-medium wp-image-99" /><strong>कैसा हो खानपान </strong><strong></strong><br />
<br />
बरसात में सबको खाने-पीने का बड़ा शौक होता है. बाहर की तली-भुनी चीजें आपके स्वाद को तो पूरा कर देती हैं लेकिन सेहत की हालत खराब कर देती हैं. इसलिए सबसे पहले अपनी भोजन संबंधी आदतों में बदलाव लाएं. बाहरी चीजों को तो ना ही कह दें.</p>
<p><strong>पानी जरा संभल कर</strong><br />
<br />
खाने के साथ पीने का पानी इस मौसम में सबसे अधिक संक्रमित होता है. अगर आप किसी दूसरे शहर जा रहे हैं तो सबसे उपयुक्त होगा मिनरल वाटर या सील बंद पानी पीना. क्योंकि बरसात में डायरिया, हैजा, पीलिया और बुखार जैसी अधिकतर बीमारियां पानी के ही कारण होती हैं. इनसे बचने के लिए आप अपने साथ पानी लेकर चलें और रास्ते में जगह-जगह का पानी पीने से बचें. यात्रा के दौरान तरल पदार्थ कम ही लें. रोस्टेड नमकीन या भेलपूरी जैसे ड्राई फूड ही लें<br />
<br />
<img src="http://jagranyatra.jagranjunction.com/files/2010/07/186579-monsoon.jpg" alt="186579-monsoon" title="186579-monsoon" width="240" height="240" class="alignleft size-full wp-image-100" /><strong>होटल में रखें सावधानी</strong><br />
<br />
होटल आदि में रुकने के दौरान इस बात का खास ख्याल रखें कि रात का खाना देर से न हो और खाने के बाद कुछ देर टहलें जरुर. खाना खाने के बाद टहलने से आपमें सुस्ती नहीं आएगी और स्फूर्ति बनी रहेगी.<br />
<br />
<strong>कुछ उपयोगी सामान </strong><strong></strong><br />
<br />
अगर आप मानसून में किसी दूसरे शहर घूमने जा रहे हैं तो कुछ विशेष चीजें जैसे उस शहर का मानचित्र, बरसाती, छाते, एक टार्च, कुछ दवाइयां जैसे पेट की और सर दर्द की आदि अपने पास जरुर रखें.<br />
<br />
इन बातों का ध्यान रख आप मानसून में घूमने का मजा तो उठा ही सकते हैं साथ ही साथ परेशानियों से दूरी भी बनाए रख सकते हैं.<br />
</font></p>
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		<title>पापमोचक रोमांचक अमरनाथ यात्रा</title>
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		<pubDate>Fri, 23 Jul 2010 09:09:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>admin</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
बम-बम भोले की गूंज और पीछे चलता भक्तों का झुण्ड. घाटी के शांति में जब शिव  भक्त बम-बम बोलते जाते हैं तो ऐसा लगता है कि खुद पर्वत भी बम भोले की पुकार कर रहे हैं. भारत में आस्था रोम-रोम में बसती है और भगवान शिव के भक्त तो कावंड़ से लेकर अमरनाथ तक [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><font size="3"><br />
बम-बम भोले की गूंज और पीछे चलता भक्तों का झुण्ड. घाटी के शांति में जब शिव  भक्त बम-बम बोलते जाते हैं तो ऐसा लगता है कि खुद पर्वत भी बम भोले की पुकार कर रहे हैं. भारत में आस्था रोम-रोम में बसती है और भगवान शिव के भक्त तो कावंड़ से लेकर अमरनाथ तक अपनी भक्ति को दर्शाते हैं.<br />
<br />
<strong>कब शुरू होती है यात्रा </strong><strong></strong><br />
<br />
<strong><a href="http://www.jagranyatra.com/2010/03/amarnath-religious-tourism-lord-shiva/" target="_blank">अमरनाथ यात्रा</a> अमूमन जुलाई और अगस्त के महीने में होती है.</strong> <strong>इस वर्ष यह यात्रा 1 जुलाई से शुरू होकर 24 अगस्त तक जारी रहेगी. </strong>अमरनाथ यात्रा को उत्तर भारत की सबसे पवित्र तीर्थयात्रा माना जाता है.<strong> </strong>वैसे तो<strong> </strong>अमरनाथ गुफा तक पहुंचने का रास्ता बहुत कठिन है, यह लगभग 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है अमरनाथ गुफा में हर साल सावन महीने में प्राकृतिक रूप से बर्फ का शिवलिंग बनता है जो विश्व में अपनी तरह का एकमात्र बर्फ का शिवलिंग है . भूविज्ञानियों के अनुसार यह बर्फ की बनी साधारण आकृति है पर श्रद्धालुओं ने इसे आस्थावश शिवलिंग का रूप दे दिया है.<br />
<br />
<strong>पावन श्रद्धा स्थल अमरनाथ </strong><strong></strong><br />
<br />
किंवदंतियों के अनुसार माता पार्वती ने एक बार भगवान शंकर से अनुरोध किया कि वह मानव को अमरता प्रदान बनाने वाला मंत्र उन्हें सिखाएं. शिवजी नहीं चाहते थे कि उस ज्ञान को पार्वती के सिवा कोई अन्य नश्वर प्राणी सुने, पर वह पार्वती का अनुरोध भी टाल नहीं सकते थे. इसलिए उन्होंने पार्वती को वह मंत्र बताने के लिए हिमालय में एक निर्जन गुप्त स्थल चुना. मान्यता है कि पवित्र अमरनाथ गुफा वही गुप्त स्थल है. आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखों लोग यहां आते हैं.<br />
<br />
<strong>कैसे जाएं </strong><strong></strong><br />
<br />
<a href="http://www.jagranyatra.com/2010/04/amarnath-religious-tourism-jammu-kashmir/" target="_blank">अमर नाथ यात्रा</a> के लिए आप अलग-अलग दो रास्तों से जा सकते हैं. पहला, पहलगाम से और दूसरा सोनमर्ग बलटाल से. पहलगाम तक जाने के लिए जम्मू-कश्मीर पर्यटन केंद्र से सरकारी बस की सुविधा मौजूद है. पहलगाम में गैर सरकारी संस्थाओं की ओर से लंगर की व्यवस्था की जाती है. तीर्थयात्रियों की पैदल यात्रा पहलगाम से ही आरंभ होती है जो चंदनबाड़ी, शेषनाग, पंचतरणी और फिर अमरनाथ गुफा तक पहुंचती है.<br />
<br />
बलटाल जम्मू से लगभग 400 किलोमीटर दूर है. जम्मू से उधमपुर के रास्ते बलटाल के लिए जम्मू कश्मीर पर्यटक स्वागत केंद्र की बसों से जा सकते हैं. तीर्थयात्री बलटाल कैंप से एक दिन में अमरनाथ गुफा की यात्रा कर वापस कैंप में आ सकते हैं.<br />
<br />
दुर्गम पहाडियां, खराब मौसम, खाई, बारिश, बर्फ और अन्य समस्याओं से जूझने के उपरांत भी श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमीं नहीं आती. गुफा पर पहुंचने पर असीम शांति का अनुभव होता है. आस्था और रोमांच से भरी इस यात्रा का वर्णन शब्दों से तो किया ही नहीं जा सकता.<br />
<br />
<strong>क्या सावधानी रखें </strong><strong></strong><br />
<br />
इस यात्रा पर अगर आप या आपके कोई संगे-सबंधी जा रहे हैं तो निम्न बातों का ख्याल अवश्य रखें जैसे :</p>
<ul>
<li>सबसे पहले यह जांच करवालें कि आप शारीरिक तौर पर फिट हैं क्योंकि गुफा 14000 फीट की ऊचांई पर है. वहां जाने के लिए आपके पास मेडिकल सार्टिफिकेट होना आवश्यक है.</li>
<li>अपने साथ उचित मात्रा में ऊनी कपडे, दस्ताने और अन्य सामान रख लेने चाहिए. साथ ही कुछ खाने का सामान जैसे बिस्कुट, नमकीन और अन्य चीजें भी रखनी चाहिए.</li>
<li>राशन और ईंधन आपको रास्ते में साथ लेकर चलना होता है जो जत्थे के आयोजक आपको मुहैया करा देते हैं इसके लिए आपसे राशि ले ली जाती है. ध्यान रखें कि तय शुल्क से अधिक मूल्य खच्चर या राशन वाले को न दें.</li>
<li>रास्ते में चलते समय ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कभी न करें.</li>
<li>जिन जगहों पर रुकना वर्जित हो वहां कभी न रुके और हमेशा जत्थे के साथ ही रहें.</li>
<li>रास्ते में धूम्रपान करना या मदिरा सेवन वर्जित है.</li>
</ul>
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इस तरह हम आशा करते हैं कि आप भगवान शिव के इस भक्तिमयी रुप और अमरनाथ यात्रा का भरपूर आनंद उठाएंगे. अगर आप यात्रा पर नहीं भी जा रहे हैं तो हमारे साथ जुडें रहें ताकि हमारे<a href="http://jagranyatra.jagranjunction.com/2010/07/23/amarnath-yatra/" target="_blank"> वीडियो और चित्रों</a> की सहायता से आप भगवान अमरनाथ और पवित्र शिवलिंग के दर्शन कर सकें.<br />
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