खजुराहो: पत्थरों पर बोलता प्रेम

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खजुराहो का नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यहां खजूर के पेड़ों का विशाल बगीचा था। खजिरवाहिला से नाम पड़ा खजुराहो। लेकिन यह अपने आप में अद्भुत बात है कि यहां कोई भी खजूर के लिए नहीं आता। यहां आने वाले इसके मंदिरों को देखने आते हैं। भारतीय मंदिरों की स्थापत्य कला व शिल्प में खजुराहो की जगह अद्वितीय है। इसकी दो वजहें हैं- एक तो शिल्प की दृष्टि से ये बेजोड़ हैं ही, दूसरी तरफ इनपर स्त्री-पुरुष प्रेम की जो आकृतियां गढ़ी गई हैं, उसकी मिसाल दुनिया में और कहीं नहीं मिलती। यही कारण है कि खजुराहो को यूनेस्को से विश्व विरासत का दरजा मिला हुआ है। भारत आने वाले ज्यादातर विदेशी पर्यटक खजुराहो जरूर आना चाहते हैं। वहीं हम भारतीयों के लिए ये मंदिर एक हजार साल पहले के इतिहास का दस्तावेज हैं।

चंदेल वंश के राजाओं ने करवाया निर्माण

खजुराहो के मंदिरों का निर्माण चंदेल वंश के राजाओं ने किया था। इनके निर्माण के पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है। कहा जाता है कि हेमवती नाम की एक ब्राह्मण कन्या थी। एक रात जब वह रति में स्नान कर रही थी तो चंद्रमा उसपर मोहित हो गए। दोनों का प्रेम परवान चढ़ा और एक देव व स्त्री के उस मिलन की परिणति पुत्र के जन्म में हुई। बिनब्याही मां होने के कारण हेमवती को जमाने भर के ताने सुनने पड़े। उसने घर छोड़ा और खजुराहो के आसपास के जंगलों में शरण ली। यहीं उसका बेटा बढ़ा हुआ। वह अपने बेटे की मां भी थी और गुरु भी। उसी बेटे ने आगे जाकर चंद्रवर्मन नाम से चंदेल वंश की स्थापना की। चंद्रमा का पुत्र होने के कारण ये राजा चंद्रवंशी कहलाए।

जब चंद्रवर्मन राजा के रूप में स्थापित हो गया तो उसने अपनी मां के सपने को पूरा करने के लिए इन मंदिरों का निर्माण कराया। अपनी इच्छाओं को पूरी करने पर समाज से अपमानित हुई हेमवती ऐसे मंदिर बनवाना चाहती थी जो इंसान की काम इच्छाओं को उजागर करता हो। ऐसा करके वह मानवीय इच्छाओं के खालीपन के अहसास को भी रेखांकित करना चाहती थी। इन मंदिरों का निर्माण तो चंद्रवर्मन ने शुरू कराया था लेकिन पूरा बाद के शासकों ने कराया। मंदिरों के निर्माण में लगभग सौ साल लगे- सन 950 ईस्वी से लेकर 1050 ईस्वी तक। उस समय कुल 85 मंदिरों का निर्माण चंदेल राजाओं ने कराया था। समय व इतिहास के थपेड़ों से बचते-बचाते अब इनमें से केवल 22 नजर आते हैं। लेकिन इन 22 में भी पूरी तरह सलामत मंदिरों की संख्या और कम है। चंद्रवर्मन ने मंदिरों के निर्माण के लिए खजुराहो को क्यों चुना होगा, इसका कोई ठोस कारण इतिहास में नहीं मिलता।

खजुराहो इस समय भी बेहद छोटा सा कस्बा है और हजार साल पहले भी एक गांव से बड़ा न रहा होगा। मान्यताएं यह हैं कि चंदेल राजा यहां धर्म व ज्ञान की पीठ बनाना चाहते थे। कुछ लोग यह भी कहते हैं चंदेल राजाओं का रिश्ता तंत्र-मंत्र से भी था जिसमें भौतिक जरूरतों के जरिये शक्ति हासिल करने को अहमियत दी जाती थी। लेकिन इन दोनों ही दलीलों के बारे में कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं मिलते। मूर्तियों का कोई केंद्रीय बिंदु खोजा जाए तो वह महिला है- जो अपने हर रूप में वहां मौजूद है। तत्कालीन समाज के आम जीवन-चक्र को भी मंदिरों की दीवारों पर जगह दी गई है।

मुख्य आकर्षण

खजुराहो का मुख्य आकर्षण पश्चिमी समूह के मंदिरों में ही है। यहीं ज्यादातर मंदिर हैं- कंदारिया महादेव, लक्ष्मण मंदिर, वराह मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, नंदी मंदिर, मतंगेश्वर मंदिर। पश्चिमी समूह का ही चौसठ योगिनी मंदिर परिसर के बाहर थोड़ा अलग जाकर है। लेकिन इस मंदिर से योगिनी की सारी मूर्तियां गायब हैं। ज्यादातर कालांतर में नष्ट हुई तो बाकी को हटाकर संग्रहालयों में रख दिया गया। पूर्वी समूह लगभग तीन किलोमीटर गांव में थोड़ा अंदर जाकर है। यहां समकालीन हिंदू मंदिर तो तीन ही हैं- ब्रह्मा, वामन और जावरी। जैन मंदिरों में पा‌र्श्वनाथ, आदिनाथ, घंटाई मंदिर हैं। जैन मंदिर बाद के दौर में बनाए गए। हिंदू मंदिरों में भी मिथुन मूर्तियां उस भव्यता के साथ नहीं हैं, जैसी पश्चिमी समूह में हैं। मुख्य परिसर से पांच किलोमीटर दूर दक्षिणी समूह है जिसमें दूल्हादेव और चतुर्भुज मंदिर हैं। ये मंदिर भी बाद के दौर में चंदेल वंश के आखिरी राजाओं ने बनवाए। सभी मंदिरों की शैली, बनावट, शिल्प, मंडप, अनूठे हैं, जिनके बारे में विस्तार से जानकारी यहां जाकर पाई जा सकती है।

तेरहवीं सदी के बाद ये मंदिर खो से गए। इनके चारों और घने जंगल उग आए। रखरखाव के अभाव और वक्त की मार से इनमें से कई नष्ट भी हो गए। अंग्रेजों के शासनकाल में एक अंग्रेज घुड़सवार अफसर ने इधर से गुजरते हुए इनको खोजा। लेकिन मंदिरों को दुरुस्त करने और इन्हें दुनिया के सामने फिर से पेश करने का सारा काम पिछली सदी के उत्तरार्ध में ही हुआ।

कैसे जाएं

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खजुराहो आगरा से 395 किलोमीटर, सतना से 117, झांसी  से 175 किलोमीटर, भोपाल से 350 किलोमीटर दूर है। खजुराहो के लिए दिल्ली (35 मिनट की उड़ान), आगरा (40 मिनट) व वाराणसी (45 मिनट) से सीधी विमान सेवा है।

खजुराहो रेल मार्ग से जुड़ा हुआ नहीं है। दिल्ली या उत्तर भारत में अन्य जगहों से आने वालों के लिए झांसी (175 किलोमीटर) ज्यादा उपयुक्त स्टेशन है। जबकि मुंबई, कोलकाता या वाराणसी से आने वालों के लिए सतना (117 किलोमीटर) स्टेशन पर उतरना ठीक रहेगा। सतना, हरपालपुर (94 किलोमीटर), झांसी व महोबा (61 किलोमीटर) से खजुराहो के लिए लगातार बसें उपलब्ध हैं।

कैसेट गाइड

पश्चिमी समूह के मंदिरों में प्रवेश के लिए दस रुपये प्रति व्यक्ति शुल्क देना होता है। पूर्वी व दक्षिणी समूह के मंदिरों के लिए ऐसा कोई शुल्क नहीं है। शाम को मंदिरों के बंद हो जाने के बाद पश्चिमी समूह के मंदिरों में रोजाना एक साउंड एंड लाइट शो होता है। इसमें प्रवेश के लिए पचास रुपये प्रति व्यक्ति शुल्क है। बच्चों के लिए यह शुल्क आधा है। पचास मिनट का शो पहले अंग्रेजी में होता है और उसके बाद हिंदी में। इसमें आकर्षक रोशनी व कमेंट्री की मदद से खजुराहो मंदिरों के निर्माण और चंदेल राजाओं के इतिहास को समेटने की कोशिश की गई है। जब आप खजुराहो जाएं तो इस शो को देखना न भूलें। दिन में मंदिर घूमने के लिए गाइड तो मिल ही जाते हैं। लेकिन यहां की एक और मजेदार व्यवस्था कैसेट गाइड हैं। इसे आप बाकी भारत में शायद ही कहीं और पाएं। मुझे तो यह कहीं देखने को नहीं मिला। इसमें आपको मामूली जमानत राशि लेकर एक वाकमैन व हेडफोन दे दिया जाता है। वाकमैन में एक कैसेट लगी होती है जो मंदिर घूमने के निर्देश देती रहती है और जरूरी जानकारी भी बताती है।

कैसेट से घूमने वालों की मदद के लिए

समूचे मंदिर परिसर में संकेत चिह्न लगे हैं। कैसेट सुनते रहें, संकेत देखते रहें और आपको मंदिर के बारे में हर जानकारी मिल जाएगी। कैसेट हिंदी व अंग्रेजी, दोनों में उपलब्ध रहती है। इसमें  कोई तथ्य बार-बार सुनने-समझने का भी मौका रहता है।

खजुराहो की प्रसिद्धि मिथुन मूर्तियों के कारण

खजुराहो की प्रसिद्धि दुनियाभर में अपनी मिथुन मूर्तियों के लिए है। वे मूर्तियां जिन्होंने वात्स्यायन को कामसूत्र लिखने की प्रेरणा दी। पुरुष व स्त्री के बीच शारीरिक संसर्ग की मूर्तियों को इतने विस्तृत तरीके से मंदिरों की दीवारों पर उतारना यकीनन उस दौर के सामाजिक जीवन का खाका खींचता है। यह बताता है कि उस समय का समाज कितना कुंठारहित था। मौजूदा दौर का समाज जिन तस्वीरों को चोरी-छिपे देखने में यकीन करता है, वह आधुनिक होते हुए भी उस समय के समाज से ज्यादा पिछड़ा हुआ था जिसने मानव प्रेम को देवालयों में सजाने की हिम्मत की। तब यौन संबंध वर्जना का विषय नहीं थे बल्कि सामान्य जीवन का एक हिस्सा थे। मूर्तियां यह भी बताती हैं कि प्रेम की शारीरिकता के जिन तत्वों को हम पश्चिम की देन मानते हैं, वे बहुत पहले से हमारे यहां मौजूद हैं। यह बात केवल खजुराहो के बारे में नहीं है।

समकालीन भारत के कई जगहों पर इसी तरह की मूर्तियां मंदिरों में देखने को मिल जाती हैं। कोणार्क व पुरी के मंदिर इसका उदाहरण हैं। वहीं सुदूर चंबा (हिमाचल प्रदेश) के मंदिरों में काम की मूर्तियों को देखा जा सकता है। चंबा अस्तित्व में लगभग उसी समय आया जब खजुराहो में चंदेल वंश स्थापित हो रहा था। वहीं कोणार्क के मंदिर बारहवीं सदी में बने, खजुराहो के गुमनामी में खोने से कुछ ही पहले। हर स्थान के अनुसार शिल्प व मानवाकृतियों में अंतर देखने को बेशक मिल जाता था। हालांकि ख्याति ज्यादा खजुराहो की मिथुन मूर्तियों को मिली। इसकी वजह यह है कि यहां मंदिरों और उनपर बनी मूर्तियों की संख्या और उन मूर्तियों में भाव-भंगिमाओं, यौन क्रीड़ाओं का विस्तार काफी ज्यादा है। यही कारण है कि आज जब आप खजुराहो जाकर वहां से कुछ यादगार लेकर आना चाहें तो कामसूत्र पर लिखी दुनियाभर की किताबें और मिथुन मूर्तियों के चित्र व उनकी मिट्टी, लकड़ी, पत्थर, धातु की बनी छोटी-बड़ी अनुकृतियां ही सबसे ज्यादा मिलती हैं।

मंदिरों की मिथुन मूर्तियों के बारे में एक धारणा यह भी सुनने को मिलती है कि उनका एक खास मकसद था। उस समय चूंकि छात्र ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरुकुलों में ही रहते थे, इसलिए इन मूर्तियों के जरिये उन्हें काम का ज्ञान दिया जाता था जो उन्हें गृहस्थ जीवन के लिए तैयार करता था। चूंकि तमाम मिथुन मू्र्तियां मंदिरों की बाहरी दीवारों पर हैं, भीतरी हस्से में नहीं, इसलिए यह भी कहा जाने लगा कि ऐसा यह दिखाने के लिए है कि लोगों को कामवासनाएं बाहर ही छोड़ देनी चाहिए। कारण जो भी रहे हों, इतनी बात जरूर तय है कि ये मंदिर एक परिपक्व सभ्यता को प्रतिबिंबित करते हैं।

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